ad

काव्य : ढूॅंढ रहा हूॅं जगह अनाहत -उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट ,बरेली


 काव्य : 

ढूॅंढ रहा हूॅं जगह अनाहत


ढूॅंढ रहा हूँ

जगह अनाहत

मंदिर- मस्जिद -गुरुद्वारों में।


नदियों- नदियों

पर्वत- पर्वत

घाटी- घाटी

डगर-डगर में

जाकर देखा 

मैंने अब तक

सघन वनों से

गाॅंव -नगर में

मंचों  पर भी

नेपथ्यों में

दिन- रातों के

आठ प्रहर में

पाॅंव मरुस्थल 

तक जा पहुॅंचे 

मन की अनहद

अगर- मगर में


पूरब- पश्चिम

उत्तर- दक्षिण ं

धधक रहे हैं अंगारों में। 

ढूॅंढ रहा हूँ 

जगह अनाहत

मंदिर -मस्जिद -गुरुद्वारों में। 


गेह -वीथिका

सनी रक्त से

है कोलाहल

शमशानों में

भाईचारा 

लुप्त हो गया

आज यहाँ पर 

इंसानों में

मृगमरीचिका 

सी मानवता        

भटक रही है  

तूफानों में          

रौब दिखाती              

आज आस्था

यहाॅं मज़हबी 

फरमानों में


सच्चाई अब           

मौन धरी है     

मुखर झूठ  है अखबारों में।                         

ढूॅंढ रहा हूँ

जगह अनाहत

मंदिर- मस्जिद- गुरुद्वारों में।


अपनेपन के 

सागर सूखे 

स्वार्थ गूॅंजता

आज गगन में

पाकिस्तानी 

खालिस्तानी 

ज़हर भरे हैं 

कितने फन में

मार भगाओ 

जयचंदों को 

आज ठान लो

अपने मन में

देश- प्रेम के

पुष्प खिलें फिर

भारत माता 

के ऑंगन में


कैद नहीं अब

रहना मुझको 

द्वेष भाव की दीवारों में। 

ढूॅंढ रहा हूँ 

जगह अनाहत

मंदिर- मस्जिद- गुरुद्वारों में। 


- उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट 

'कुमुद- निवास' ,बरेली (उत्तर प्रदेश) 

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post