रुपया गुरु है, बाकी सब उसके चेले !
- आत्माराम यादव वरिष्ठ पत्रकार
दुनिया में जिस रात को रुपया पैदा हुआ,उस रात को कोई पैदा नहीं हुआ इसलिए रुपया जैसा कोई नहीं है ओर न ही दिखाई देता है । जिस रात रुपया पैदा हुआ उस रात रुपए के साथ यदि कोई पैदा होता तो संभवत वह जीवित होता। यानी रुपया जीवित है ओर उसके साथ का कोई ओर जीवित नहीं है। यह बात इसलिए पूरे दावे के साथ कहना पड़ रहा है कि रुपए के साथ कोई ओर भी जीवित रहता है तो वही दिखाई देता। रुपया जिसके पास हो वह अमीर ओर पूंजीपति हो जाता है ओर रुपया होने से उसका नाम ओर यश पूरी दुनिया में हो जाता है,। जिसके पास गड्डियों में,बैग में, अटैची में करारे करारे नोट आते है तो उसे देखकर उसका मन कुलांचे भरता है किन्तु यह सभी देखने को नही मिला कि रुपया आने पर वह रुपयों को चाट रहा हो या रुपया उसे चाट रहा हो? इससे कहा जा सकता है कि रुपया मनुष्यों के बीच में आकार मानवीय हो गया है तभी रुपया का एक नाम माया भी कहा गया है ।
रुपए का एक नाम माया भी है। माया तेरे तीन नाम। परसा परसी परस्रराम। ये माया के नाम एक गरीब आदमी से शुरू हुये है। जो समाज में सबसे गरीब है उसे पर्सा जैसे छोटे नाम से बुलाते है जिसकी आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक हुई तो उसका नाम परसी हो जाता है ओर जिसके पास रुपया ही रुपया हो यानि धन का अंबार लग जाये तो उसे इज्जत से परसराम बोला जाता है। यानि रुपया होने से वह सम्मान पाता है ओर उसके पैर जमी पर नही टिकते। यहाँ रुपया आने पर व्यक्ति के मानवीय स्वरूप में भी बदलाब आ जाता है ओर वह अपने से छोटों के साथ ओर बड़ों के साथ क्या व्यवहार करना चाहिए यह रुपयों कि उपयोगिता उसे बखूबी सिखा देती है। जो सिद्ध करता है कि रुपया गुरु है ओर बाकी सब उसके चेले चपाटी है। रुपया यानी गुरु जिसके पास हो वह उसके उपयोग दुरुपयोग को समझ लेता है ओर वैसा ही आचरण करना शुरू कर देता है। कहा जाता है कि जिसके पास रुपया हो ओर विद्या कंठस्थ हो तब वह दोनों तब काम आती है जब वह निजी हो ओर परिश्रम से आई हो।
सूत्र है व्यापारे वर्धते लक्ष्मी , अथवा व्यापारे बसते लक्ष्मी, इस मूलमंत्र को जो अपना ले वह दुनिया में सभी का दिल जीतने के साथ अपार धन कमाता है, इस कला को या हुनुर को सिंधी समाज के साथ राजस्थान-गुजरात के मारवाड़ी समाज ने अपना कर पूरे देश के बाजार पर कब्जा कर लिया है। आप किसी भी प्रदेश के छोटे बड़े किसी भी नगर, कस्वे में देख ले राजस्थान-गुजरात के व्यक्ति बोलचाल, वाक्पटुता ओर भावताब में किसी कालेज के प्रोफेसर से कम नहीं है जिसका जीता जागता प्रमाण देख ले कि राजस्थान में दूर दूर तक रेत के ढेर को स्वर्ण के ढेर बनाने की कला वहाँ के मारवाड़ी समाज के बच्चे बच्चे को पता है इसलिए उन्होने रेगिस्तान को अर्थात सूखे बालू के सागर को सिंचित बना लिया है। मारवाड़ियों में एक कहावत है की मारवाड़ी अपनी माँ के पेट से व्यापार की दक्षता लेकर पैदा होता है, इसलिए अगर देश में हुंडी का चलन राजस्थान से माना गया है ओर यहा के लोगों ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए "हुण्डी" का प्रचलन किया। जिस समय देश में बैंकिंग सिस्टम नहीं या, राजस्थानी व्यापार व्यवसाय हेतु भारत को छोड़कर सात समुद्र पार विदेशों तक भी पहुंचे। वहां के निवासियों को उन्होंने अपनी कला व संस्कृति का पाठ भी पढ़ाया ।
हम सब यह मानकर चलते है कि अपना घर कैसा भी हो हमारे लिए अपना अपना घर प्रिय लगता है इसलिए देश में रूखा सूखा खाकर कम मजदूरी पाकर हम ओर आप अपनी मानवीय भावना ओर पारिवारिक रिश्ते की मजबूती के लिए अपनी जन्म भूमि में ही रहना चाहते है परन्तु राजस्थानी स्वाबलम्बी रहे हैं। व्यापार हेतु अपना घर परिवार छोड़ कर चले जाते हैं, जबकि बिहार ओर उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ ओर मध्यप्रदेश के अधिकांश लोग भी जाते है किन्तु वे व्यापार के लिए नहीं बल्कि मजदूर बनने छोटे मोटे कर्मचारी बाबू बनने कि भावना लिए निकलते है तो वे उसमें सफल होते है । इन सभी घर छोडकर जाने वाले के पीछे घरों में नारिया, सेजों में सोयी हुई उनकी गोरी, के यौवन की उमंगे ढल जाती है। माता पिता का स्नेह लाडली बहन का प्यार छोड़कर वे सभी प्रवास में अर्थार्जन हेतु देश विदेश में कही भी जाने को तत्पर होते हैं। यह कहावत प्रचलित है भू बिना भाग नहीं जागे' अर्थात् देश देशान्तरों की यात्रा के बिना उसका भाग्य चेतता नहीं है। यहा के लोगों का मानना है कि जो जीवन निर्वाह के लिये अपना घर परिवार छोड़कर घूमता फिरता है वह सब कुछ पाता है, खोता नहीं। इसलिये यह कहते हैं-" रोटी नठेई पर, रोटो सवसू मोटी " जहाँ मनुष्य को रोटी रोजी मिल पाती है उनको वहीं पर मानना चाहिये । रोटी हो जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण होती है,रोटी कि चाह लिए बिहार,उत्तरप्रदेश, छतीसगढ़ आदि के युवा कठोरश्रम के बाद जितनी चाह लिए होते ही उतना पाते है जबकि सिंधी,गुजराती ओर राजस्थानी व्यापारी घोर परिश्रम से छोटे से छोटे काम को लेकर बड़े से बड़े काम को अपने हाथों से खुद करते हैं।
समाज का जो वर्ग रुपए को गुरु बनाकर उसका शिष्य बनने को तैयार होता है गुरु रुपए कि कृपा प्राप्त करने में सफल होता है। सिंधी समाज, राजस्थानी व मारवाड़ी समाज के लोगों को देखे वे आज व्यापार में जिस ऊंचाई पर है वह ऊंचाई पाने के लिए इन्होंने न स्कूलों में इसकी पढ़ाई की है ओर न कोई पुस्तक पढ़ी है। इनके पूर्वजों के समय न तो कोई पुस्तके थी, न प्रेस थी जहा ये छपती? इन्होने तब व्यावहारिक जीवन में कहावतों-मुहावरों द्वारा ही सामान्य ज्ञान में व्यापार सीखा था। इन लोगों ने कोई विश्वविद्यालय तथा स्कूल में अर्थशास्त्र की शिक्षा ग्रहण नही की, अपनी मातृभाषा सिंधी राजस्थानी ओर गुजराती के अलावा इनको किसी भी भाषा का पूरा ज्ञान नहीं. इन व्यापारी लोगों के जनजीवन मे अर्थशास्त्री कहावतों की गहराई है तो वह उनके लोक साहित्य के मुहावरों में है जो प्राचीन समय से इनकी धरोहर है जिससे लोक जीवन में व्यवहार ओर वाकपटुता इनके व्यापार के लिए सर्वोत्तम माणिक मणियों है जो गुरु रूपी रुपया की असीम कृपा पाने हेतु ये सब अपने गुरु के अच्छे शिष्य साबित होते है।
- आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्री जगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाइल- 9993376616
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