काव्य :
प्रेम का संसार
टूट रहा हर तरफ रिश्तो का व्यवहार ,
विलुप्त हो रहे सभ्यता संस्कृति संस्कार,
मेल मिलाप मधुरता हो रही दरकिनार,
जरूरत है आज बसाये हम प्रेम का संसार।।
लोलुपता हर तरफ बढ़ रही लगातार,
टांँग खींचने की हो़ड में खत्म हो रहे व्यापार ,
हो रही हर तरफ मानवता शर्मसार,
जरूरत है आज बसाये हम प्रेम का संसार।।
धर्म, न्याय ,कानून की बढ़ रहा भ्रष्टाचार,
हर तरफ देती सुनाई केवल हिंसा की चीत्कार,
समय सोच संबंधों में बढ़ रही है दरार,
जरूरत है आज बसाये हम प्रेम का संसार।।
मित्रता नाम पर छुरा घोप रहा है नार,
धोखे की बिजलियांँ कड़कती है हजार,
जिसके शोर से घबराता मानव हर बार ,
जरूरत है आज बसाये हम प्रेम का संसार।।
व्यथित वेदना से रोता मन बारंबार,
खुशियां रूपी पोटली की हर किसी को दरकार,
रिश्ते मे मिठास हरपल रहे बरकरार ,
इसीलिए जरूरत है बसाये हम प्रेम का संसार।।।
- नीता गुप्ता , रायपुर छत्तीसगढ़
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