प्रभात साहित्य परिषद भोपाल द्वारा आयोजित मुशायरा संपन्न
भोपाल । राजधानी की चर्चित संस्था प्रभात साहित्य परिषद द्वारा दुष्यंत संग्रहालय के सभागार में याद-ए शफ़क़ तनवीर के अंतर्गत मुशायरे का आयोजन श्री महेश प्रसाद सिंह अध्यक्षता में एवम डॉ.अलीअब्बास उम्मीद के मुख्य आतिथ्य में तथा श्री निसार मालवीय (विदिशा) के विशेष आतिथ्य में एवम श्री घनश्याम मैथिल अमृत के संचालन में किया गया।
इस अवसर पर सूर्य प्रकाश अष्ठाना सूरज एवम प.सुरेश नारायण शर्मा को शफ़क़ तनवीर सम्मान से अलंकृत किया गया। तदुपरांत मुशायरे में मदन तन्हाई(इटारसी) ने पढ़ा कौन कहता है घर में रहता हूँ। हर घड़ी में सफर में रहता हूँ। वही वृन्दावन सरल (सागर) ने पढ़ा कच्चे फलों से छीन ली जीने की आरजू, मौसम का इंतजार किसी ने नहीं किया। वही घनश्याम अमृत ने पढ़ा भूखे की तू रोटी लिख एक कहानी छोटी लिख। क्यों जुलाहा नंगा है उसको एक लँगोटी लिख। वही गोपाल देव नीरद ने पढ़ा जब तुम ही उतर गये पानी से भी नीचे, कौन सा हाथ फिर तुम्हें खींचे। वही रमेश नन्द ने पढ़ा सफर अपने जीवन का आसान रख। जरूरत से ज्यादा न सामान रख। वही चन्द्रभान राही ने पढ़ा जलता है जब जिगर तो कोई पूछता नहीं। दुनिया से उठ गया तो वजा पूछ्ते हैं लोग। वही डॉ. किशन तिवारी ने पढ़ा अपनी हद से गुजर गया पानी। जब से आँखों का मर गया पानी। वही सूर्य प्रकाश अष्ठाना ने पढ़ा शफ्फाफ थी शफीक थी रोशन थी जिंदगी। दामन बुराइयों से बचाकर चले गये। वही डॉ. विमल शर्मा ने पढ़ा तेरे साथ का ये असर लग रहा है। मुझे दर्दे दिल बे असर लग रहा है। वही शाहिद अली शाहिद (विदिशा) ने पढ़ा न तो शमशीर से न तीर से डर लगता है।खून को खून की तासीर से डर लगता है। वही दिनेश भदोरिया शेष ने पढ़ा रात अंधियारी बहुत भाई मुझे।वहीं सुरेश पबरा आकाश ने पढ़ा, कल किसी के प्यार ने धोखा दिया,आज तो परिवार ने धोखा दिया।वहीं नजीर नूरी (विदिशा) ने पढ़ा, ये हकीकत है इसे संजीदगी से सोचिए,मुश्किलों से मुश्किलों का हल निकलता ही नहीं। अन्त में रमेश नन्द ने सभी का आभार व्यक्त किया।
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