काव्य :
भारत भूमि
भक्ति की पावन धरा
शक्ति से अभिमंत्रित,
नाद की सुरसरिता में
शिव-शक्ति का वास है।
सुर-नाद की गूँजार यहाँ
प्रकृति का भंडार भरा,
धरती की स्वर्ग-धरा पर
पवित्र आत्माओं का वास है।
पंछियों का मनोरम कलरव,जीव-जंतुओं
का सम निवास यहाँ,
त्रिशूल,त्रिपुण्ड,त्रिनेत्र-
धारी,त्रिपुरारी का वास है।
द्वैत,अद्वैत,अद्वैतादैत,
निर्गुण-सगुण की बहती
भक्ति सलीला है,पीर,
फकीर , फरिश्तों
का रहता सदैव वास है।
- डा.नीलम ,अजमेर
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