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काव्य : कोई नहीं जाता कहीं पर - कमलेन्दु पाण्डेय , सूरत( गुजरात) -


 काव्य : 

कोई नहीं जाता कहीं पर


*कोई नहीं जाता कहीं पर,*

बदलकर मिट्टी के चोले हम सभी रहते यहीं पर।

कर्म के अनुबंध से हर जन्म में संबंध बनते,

जिंदगी की नाव मे कुछ लोग चढ़ते, कुछ उतरते।

स्थूलता से सूक्ष्म होना, सूक्ष्म से फिर स्थूल होना।

आत्मा की यह क्रिया चलती ही रहती है निरंतर। 

*कोई नहीं जाता कहीं पर।*


माना कि कर जाता हमें व्याकुल किसी का छोड़ जाना,

मन को कर जाता व्यथित  संबंध सहसा तोड़ जाना।

यात्रा है, यात्री हम, अलग है गंतव्य सबका,

इसी से मन को मनाकर, निकल जाना है सफर पर।

*कोई नहीं जाता कहीं पर।*


मन और बुद्धि, चित्त से हटकर कहीं आस्तीत्व अपना, 

यह दृश्यमान जगत भी कुछ क्षणों का गतिमान सपना!

आत्मा पर शोक करना तर्क से बिल्कुल परे है,

हम सभी शाश्वत सनातन, सदा से रहते निरंतर। 

*कोई नहीं जाता कहीं पर।*

 

- कमलेन्दु पाण्डेय , सूरत( गुजरात)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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