काव्य :
निर्धनता का अंत
धरती के अंदर जलधारा अंतर्मन में ज्वार भरा,
कोई जलप्रपात बन फूटा कोई अंदर ही ठहरा।
लकुटी ले चलते जीवन-पथ दीन-दुखी करुणा याचक,
ना जाने कितने जन्मों का पाप-पुण्य यह अति घातक।
शैशव, यौवन, वैभव छूटा ममता किंतु नहीं छूटी,
अपनों का भी साथ गया इक जीवन आस नहीं छूटी।
सर्वे भवन्तु सुखिनः अपना बहुत पुराना नारा है,
निर्धनता का अंत समाज से शाश्वत स्वप्न हमारा है।
-डाॅ. सुधा कुमारी
नई दिल्ली
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