काव्य :
अन्वेषण
हम सब अन्वेषी हैं बस इक राह के
कारण मिलें जहाँ चाहतों के अंबार के
जीना जीवंत हो सदा बहाने न हों जहाँ
शुद्ध वजूद हों जैसे शीतल बयार के।
सच हो बिना किसी आवरण के जहाँ
प्रेम हो किसी भी छल कपट के बिना
हृदय की स्वच्छता नीरव प्रकाश हो
सब कुछ शुद्ध हो आरेपण के बिना।
न हों भेद जहाँ न भेदों की सीमाएँ
सह अस्तित्व हो, अरु निश्छलताएँ
नफ़रतों की कोई जगह न हो वहाँ
बहें सदा जहाँ सत्य प्रेम की सरिताएँ।
आओ चलें ऐसी राह खोजने चलें
राह खोजते रहें पर राह कभी न बनें
जीयो व जीने दो की इच्छा के साथ
आओ साथ चलें राह नहीं राह बनें।
- डॉ. सत्येंद्र सिंह
पुणे महाराष्ट्र
Tags:
काव्य
.jpg)
