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प्रसंगवश - क्या सरकारी रेवड़ियां अकर्मण्यता बढ़ा रही है ? - डॉ घनश्याम बटवाल , मंदसौर


 ♦️प्रसंगवश - 

क्या सरकारी रेवड़ियां अकर्मण्यता बढ़ा रही है ?             

डॉ घनश्याम बटवाल , मंदसौर 

   पहले भी यह बात सामने आई थी जब दिल्ली चुनाव चल रहे थे ,अब तो परिणाम भी आगये हैं सरकार गठन भी होना है  , सवाल फिर सामने है कि आखिर जो घोषणाएं राजनीतिक दलों ने की उनको लागू कैसे किया जायेगा ? घोषणा तक ठीक है पर आर्थिक व्यय सरकारी तंत्र कैसे वहन करेगा , कहीं आर्थिक भार कामकाजी और मध्यम वर्ग पर तो नहीं पड़ेगा ?

प्रश्न कई उठ रहे हैं

और अब तो देश की सर्वोच्च अदालत ने मुफ्तखोरी और रेवडिय़ों वाली योजनाओं पर चिंता के साथ-साथ नाराजगी भी जताई है। इन मुफ्त सुविधाओं के चलते लोग काम नहीं करना चाहते। खेतों में मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं। लोगों को मुफ्त अनाज मिल रहा है। बिना काम किए नकदी पैसे मिल रहे हैं। मुफ्त पेंशन बांटी जा रही हैं। कई मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं कर सुविधाएं दी जा रही हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह ने एक आशंकित सवाल किया है कि क्या हम परजीवियों का एक वर्ग तो नहीं बना रहे हैं? समाज जीवन पर इसके प्रभाव देखने मे आरहे हैं जब घर बैठे राशन बैंक खातों में राशि मिल रही है तो एक वर्ग ऐसा भी तैयार होने लगा है कि श्रम करने या उद्यम करने की क्या जरूरत है ?  हालात तो ऐसे भी देखने आये हैं कि मजदूरों की कमी महसूस होने लगी है ।

वस्तुतःराष्ट्रीय विकास के लिए लोगों को मुख्यधारा में लाने के बजाय हम उन्हें नकारा बना रहे हैं। मुफ्तखोरी और रेवडिय़ों का देश के खजाने पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। देश और राज्यों पर कर्ज के बोझ असहनीय होते जा रहे हैं। बजट में कटौतियां कर सरकारें रेवडिय़ां परोसने को विवश हैं, क्योंकि अब यही राजनीति हो गई है। सवाल यह भी है कि इन लोगों को विकास में योगदान देने के अवसर क्यों न दिए जाएं? यह कर्ज का बोझ है अथवा मुफ्तखोरी बांटने का असर है कि 2025-26 के राष्ट्रीय बजट में स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, कृषि, समाज कल्याण, प्रधानमंत्री आवास योजना, फसल बीमा योजना, जल-जीवन मिशन, प्रधानमंत्री मुफ्त अनाज योजना आदि के बजट में कटौतियां करनी पड़ी हैं। देश पर 200 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है। व्यापार घाटा भी बढ़ रहा है । आंकड़ों के मुताबिक आयात निर्यात में भी असमानता ज्यादा हुई है ओर अब अमेरिका सहित अन्य देशों का टैरिफ वार ट्रैड वार में बदलता जान पड़ता है गत वर्ष की तुलना में कोई  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मोटा हिस्सा कर्ज और उसका ब्याज चुकाने में खर्च करना पड़ रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक भी इस मुद्दे पर चिंता और सरोकार जताते हुए कह चुका है कि जीडीपी के 20 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज लेना ठीक नहीं है।  मध्यप्रदेश राजस्थान छत्तीसगढ़ बिहार कर्नाटक आदि राज्यों द्वारा वित्तीय संस्थानों से प्रति महीने कर्ज़ उठाया जारहा है । हाल ही में महाराष्ट्र और दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए हैं। दोनों चुनावों में मुफ्तखोरी और रेवडिय़ों की जमकर बोलियां लगाई गईं। दिल्ली में एक लंबे अंतराल के बाद भाजपा सत्ता में लौटी है। अभी सरकार का गठन होना है, लेकिन अनुमान सामने आ रहे हैं कि मुफ्तखोरी की योजनाओं को लागू करने के लिए कमोबेश 25,000 करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी। दिल्ली का कुल बजट ही 76,000 करोड़ रुपए का है। अब घोषणा लागू कराने का फंड कहां से आएगा ?

राज्यों की लागू कथित कल्याणकारी योजनाओं के लिये लिया कर्ज़ बढ़ रहा उस ऋण का ब्याज चुकाने में राज्यों की अर्थव्यवस्था हांफने लगी है 

मध्यप्रदेश का उदाहरण सामने है मुख्यमंत्री के मुताबिक लाड़ली लक्ष्मी योजना में राशि बढ़ाकर तीन हजार रुपये महीने करेंगे जबकि वित्तमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री का कहना है राशि वृद्धि की फ़िलहाल कोई योजना नहीं है ।

हिसाब देखें तो दिल्ली सरकार के वार्षिक बजट से करीब 62-64 हजार करोड़ रुपए वेतन, भत्तों, पेंशन आदि पर खर्च हो जाते हैं। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए करीब 6000 करोड़ रुपए ही शेष बचते हैं। तो नए खर्चों के लिए 25,000 करोड़ रुपए कहां से आएंगे? महाराष्ट्र में 1 लाख करोड़ रुपए की बजट में कटौती का खतरा आसन्न है। मुफ्त योजनाओं को मिला कर 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का घाटा हो सकता है। राज्य पर कर्ज 7.11 लाख करोड़ रुपए का है। शिव भोजन थाली, तीर्थ यात्रा, आनंद सिद्धा आदि योजनाएं या तो बंद करनी पड़ी हैं अथवा बंद होने के कगार पर हैं। जिस ‘लाडकी बहिन’ योजना के बल पर भाजपा-महायुति की सरकार बरकरार रही है, उस योजना के वर्गीकरण पर पुनर्विचार किया जा रहा है, क्योंकि इस योजना पर 46,000 करोड़ रुपए अनुमानित खर्च है। जाहिर है कि कई महिलाओं की नकदी पर गाज गिरना तय है। 

ठेकेदार अपने काम के भुगतान मांगने को कपड़े फाड़ रहे हैं, लेकिन लगातार घाटों के कारण सरकार की सांसें फूली हैं। ऐसे फलितार्थ लगभग सभी राज्यों में सामने आ रहे हैं। बहरहाल सर्वोच्च अदालत ने नाराज टिप्पणी की है, कोई फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन मुफ्तखोरी और रेवडिय़ां बांटना अब भारतीय राजनीति का अंतरंग हिस्सा बन गया है। रेवडिय़ां बांट कर राजनीतिक दल चुनाव जीत रहे हैं और सत्ता में आ रहे हैं। ये राजनीतिक दल मुफ्तखोरी को ‘कल्याणकारी’ मानते हैं और गरीब जनता के प्रति सरकार का दायित्व भी मान रहे हैं। ऐसे में शीर्ष अदालत के दो न्यायाधीश कोई फटकार जैसी नाराजगी जताएं, तो उसके कोई खास मायने नहीं हैं। बहरहाल रेवडिय़ों को परिभाषित नहीं किया जा सका। सभी राजनीतिक दल होड़ कर रहे हैं इस पर चिंतन होना चाहिए।

योजनाओं में महिला , स्टूडेंट्स ,युवा , किसान , वृद्धजन , बेरोजगार , श्रमिक , पेंशनर कोई अछूता नहीं है 

जबकि सरकारों को रोजगार , श्रम और कर्म के अवसर और वातावरण देने की जरूरत है ।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक निर्यात गुड्स की धीमी वृद्धि से जनवरी 2025 में देश का व्यापार घाटा बढ़कर 23 अरब डॉलर तक पहुंच गया है जबकि गत वर्ष यह 16 - 17 अरब डॉलर तक था , मतलब कोई 7 अरब डॉलर घाटा एक साल में ही बढ़ गया । अपने राजनीतिक लाभ के लिये सरकारों और पक्ष - विपक्ष को देश को ही दाव पर लगाने से बचना होगा अन्यथा संकट गहरा होता जाएगा ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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