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लघु कथा संग्रह “किसकी किस्मत ?कौन जाने" का हुआ विमोचन


जीवन की घटनाओं की संवेदनशीलता की रोचकता है पुस्तक में - नीलिमा पिंपलापुरे 

इस पुस्तक के माध्यम से समाज को नई दिशा एवं सकारात्मक संदेश मिलेगा

किसी भी वस्तु या विषय के रसास्वादन के लिएदृष्टि की आवश्यकता होती है - बृजेश मिश्र 

लघु कथा संग्रह “किसकी किस्मत ?कौन जाने"का हुआ विमोचन

सागर।   लेखक एवं साहित्यकार आर के तिवारी की नवमी कृति "किसकी किस्मत ? कौन जाने"का विमोचन श्यामलम् संस्था द्वारा सिविल लाइंस स्थित दीपक सभागार में रविवार को संपन्न हुआ। इस‌ अवसर पर कार्यक्रम की मुख्य अतिथि लेखिका एवं समाजसेवी डॉ. नीलिमा पिंपलापुरे ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस लघुकथा संग्रह में सरल और सटीक भाषा में लेखक ने अपने विचारों को इन कहानियों द्वारा दर्शाया है । लेखक ने जीवन की छोटी छोटी घटनाओं को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है । इस पुस्तक के माध्यम से समाज को नई दिशा एवं सकारात्मक संदेश मिलेगा ।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विदुषी लेखिका डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय ने कहा कि भारतीय जीवन प्रणाली गीता के कर्मयोग पर आधारित है। भारतीय जनमानस कर्म की महत्ता को स्वीकारते हुए भी भाग्य के लेखक को ही अंतिम निर्णय मानते हैं। 'हुई है वही जो राम रचि राखा' तथा 'भाग्यम् फलति सर्वत्र न च विद्या न च पौरुषम्' जैसी ही कर्म योगी के जीवन में भी सही सिद्ध होती हैं।

विद्या और पौरुष यानी परिश्रम भाग्य के सामने घुटने टेक देते हैं। मनुष्य नहीं जानता कि उसके या किसी के भी भाग्य में क्या लिखा है।  इसी भाग्यवाद को केंद्र में रखकर वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार तिवारी जी ने पुस्तक की शीर्षक कहानी लिखी। यह कहानी और इस मर्मस्पर्शी आत्मीयतापूर्ण शैली में लिखे गए इस संग्रह के लिए लेखक सराहना का पात्र हैं।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि कबीर गायकी के लिए देश में ख्यात भजन गायक बृजेश मिश्र दिल्ली ने अपने वक्तव्य में कहा कि ’जाति ना पूछो साधु की, पूछ लीजियो ज्ञान, मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान’। ऐसे ही लेखक हैं तिवारी जी जो लेखक घराने से ना होते हुए भी अपने कौशल और मेहनत से साहित्य के क्षेत्र में यहां तक पहुंचे हैं । किसी भी वस्तु या विषय के रसास्वादन के लिए दृष्टि की आवश्यकता होती है। इस पुस्तक में कहानीकार ने इसी नजरिए के होने का परिचय दिया है। 

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों द्वारा मां सरस्वती जी के चित्र पर पुष्प अर्पण पश्चात् कवि मुकेश तिवारी द्वारा की गई मधुर सरस्वती वंदना से हुई। अतिथि स्वागत उमा कान्त मिश्र, कपिल बैसाखिया, डॉ अंजना चतुर्वेदी तिवारी और एड.अमित तिवारी ने किया। श्यामलम् अध्यक्ष उमा कान्त मिश्र ने स्वागत भाषण दिया। कार्यक्रम का सफल संचालन कवि प्रदीप पाण्डेय ने किया तथा श्यामलम् सह सचिव संतोष पाठक ने आभार व्यक्त किया। लेखक तिवारी ने अपने वक्तव्य में साहित्य लेखन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की बात कही तथा मंचीय अतिथियों को‌ स्मृति चिन्ह भेंट किए। डॉ विनोद तिवारी ने रघु ठाकुर जी द्वारा प्रेषित शुभकामना संदेश का वाचन किया।पत्रकार काशीराम रायकवार ने भी अपने विचार रखे।

इस अवसर पर नगर के साहित्यकर्मियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति उल्लेखनीय रही जिनमें एल एन चौरसिया,पी एन मिश्रा,आर सी चौकसे, शिव रतन यादव, रमेश दुबे,अंबिका यादव, डॉ आशीष द्विवेदी,डॉ चंचला दवे, डॉ विजय लक्ष्मी दुबे, डॉ सुश्री शरद सिंह,निरंजना जैन,डॉ कविता शुक्ला, शांभवी शुक्ला मिश्र, हरी सिंह ठाकुर, आशीष ज्योतिषी, डॉ आर आर पांडे, राघवेंद्र नायक,टी आर त्रिपाठी,पी आर मलैया, उमा शंकर रावत, डॉ अनिल जैन,ज ला राठौर, के एल तिवारी,पूरन सिंह राजपूत, अभिनंदन दीक्षित, हरी शुक्ला, डॉ विनोद तिवारी,पैट्रिस फुस्केले, नम्रता फुस्केले, डॉ नलिन जैन,बि हारी सागर, काशीराम प्रजापति, मुकेश निराला, प्रभात कटारे,पवन रजक,सिद्धार्थ शंकर शुक्ला, डॉ अलका शुक्ला, देवी सिंह राजपूत,पवन‌‌ रजक,वीरेंद्र प्रधान ,आशुतोष उपाध्याय, नरेंद्र जैन के नाम शामिल हैं।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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