काव्य :
सुनो ना !
सुनो
क्या मुझे पहाड़ की चोटी समझे थे
कि वहां तक चढ़कर तुम शिखर पा जाओगे
मैं तो महासागर की गहराई में छुपी
एक छोटी सी नदी हूं
मिलोगे तो डूब जाओगे
मैं काशी के घाट सी भी नहीं
कि तुम्हे मोक्ष मिले
मैं तो शिव की आंख से बहा
वो अश्रु हूं,जो रुद्राक्ष बन लटका है पेड़ पर
मैं
वो नदी हूं
जो तुम्हे बहाकर
नर्मदा में पहुंचा देगी
फिर डूब जाना नर्मदा के अश्रुओं में
क्योंकि वहां से निकला साधारण सा पत्थर भी
शालिग्राम बन निकलता है
खुद खो जाओगे
तभी तो मुझे पाओगे।
- मिष्टी गोस्वामी , दिल्ली
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Wah wah wah bahut hi lajwab 🙏🏻
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