काव्य :
संभाव्य
ये पता नहीं कि सबकुछ सही होगा,
मेरा उद्देश्य और सफल संभाव्य होगा ,
मेरी कहानी और किरदार आपका
होगा!
नहीं जानती,
पर इतना अवश्य जानती कि सब अच्छा होगा,
छूटते हाथों से जीवन उद्धार होगा,
आंखों में चमक और हृदय में जूनून होगा।
नहीं जानती ,
नेत्रसागर कितना गहन गहरा होगा,
खारापन से भरा या मिठास परिपूर्ण होगा,
पर इतना अवश्य है नदी में बदल तृप्त होगा।
नहीं जानती,
घने जंगलों में भटकते उनका क्या होगा,
तिमिर संभाव्य या उज्ज्वल अधिक होगा,
पर इतना अवश्य है कि ईश्वर के आश्रम में एक विश्वास होगा।
नहीं जानती,
जिनके स्नेह पर चली हूं क्या होगा,
विश्वास मेरा और आंगन उनका होगा,
पर इतना अवश्य है कि मुख मेरा और कीर्तन उनका होगा।
नहीं जानती,
वह तृप्त होगा या मानवता में लिप्त होगा,
स्वार्थ की शैय्या या परमार्थ का सेवक होगा,
पर इतना अवश्य है कि मन का दीपक और प्रकाश का लौ होगा।
ये पता नहीं कि सबकुछ सही होगा,
मेरा उद्देश्य सफल संभाव्य होगा ,
या मेरी कहानी किरदार आपका
होगा!
- प्रियंका कुमारी मानगो जमशेदपुर
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