काव्य :
मेरे शहर की सड़क
एक अरसा पहले
ये सड़क कहीं पहुंचती थी,
अब तो भागीरथी-सी
खड्ढों में ही रुक जाती है।
अस्थि-पंजर जगह-जगह
निकल आये इस तरह
कि आइने में खुद को
पहचान नहीं पाती है।
अपनी दीन दुर्दशा पर
सुन-सुनकर ताने,
मेरे शहर की सड़क
रोज आंसू बहाती है।
कब कोई भगीरथ-सा
दृढ़संकल्प आयेगा,
दुखों से मुक्त कर इसे
अपनी जगह पहुंचायेगा?
-डाॅ. सुधा कुमारी
दिल्ली
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