क्या हम हिंदी से देवनागरी को अलग कर रहे?
यदि कहा जाए कि हिंदी बोलने वालों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज जनसंख्या की दृष्टि से भारत पहले स्थान पर है।
भारतीय मूल के लोग दुनिया के किसी भी हिस्से में गए तो उनके साथ उनकी भाषा हिंदी भी गई। वास्तव में भाषा अपने विचारों और अपनी भावनाओं को प्रकट करने का माध्यम ही नहीं है बल्कि यह अपनी संस्कृति एवं अपने लोगों को साथ जोड़ती है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी भाषा ने लोगों को जोड़ने में अपनी अहम भूमिका निभाई । अंग्रेजों के खिलाफ इसका प्रयोग एक हथियार के रूप में किया गया। आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भाषा की महत्ता पर ही कहा था,
“निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।”
हिंदी भाषा के महत्व को हमारे राजनेताओं और संविधान निर्माताओं ने समझा । इसलिये ही आजादी के बाद भारत की संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया और देवनागरी लिपि में लिखा।
इस निर्णय को प्रतिपादित करने के लिए 1953 से पूरे भारत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य हिंदी भाषा को सम्मान देना, उसके महत्व को बढ़ाना और लोगों को हिंदी के उपयोग के लिए प्रेरित करना है । यह अलग बात है कि आज भी व्यावहारिक रूप में अंग्रेजी इसके साथ प्रतिस्पर्धा में लगी हुई है । इसका कारण दूसरा कोई नहीं बल्कि हम सब हैं।
हम अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में ही पढ़ाना चाहते हैं। चार लोगों के सामने चार वाक्य अंग्रेजी में बोलकर अपनी श्रेष्ठता बताना चाहते हैं। किसी घरेलू आयोजन का भी कार्ड छपवाना हो तो अंग्रेजी में छपवाना चाहते हैं।
लेकिन आज इससे भी बड़ी समस्या हिंदी के सामने सुरसा की भांति मुंह फैलाए खड़ी है और यह हिंदी की लिपि देवनागरी से जुड़ी है । आपने ध्यान दिया होगा व्हाट्सएप पर जब मैसेज करना हो तो लोग हिंदी तो लिखते हैं,लेकिन वह होती है रोमन लिपि में। इसी तरह से विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी के दौरान छात्रों को गीत या डायलॉग दिए जाते हैं तो वह इस हिंदी को रोमन लिपि में लिखने लगते हैं। इस तरह के कई उदाहरण हमें पढ़ने लिखने के दौरान मिल रहे हैं ,जिससे लगता है, अगर ऐसा ही चलता रहा और हमने ध्यान नहीं दिया तो ऐसा न हो कि आने वाले युगों में हमारी लिपि ही विलुप्त हो जाए।
हम सबको देवनागरी लिपि के अतीत एवं इसके विकास से परिचित होना चाहिए। इसकी उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि से मानी जाती है, जो भारत की एक प्राचीन लिपि है। यह भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया की अधिकांश आधुनिक लिपियों की पूर्वज है। भारत में यह पहली से चौथी शताब्दी में विकसित हुई और सातवीं शताब्दी तक यह नियमित प्रयोग में आ गई। देश के अनेक भाषाओं की लिपि देवनागरी ही है, जैसे संस्कृत, मराठी सिंधी, कोंकणी, तमांग, अंगिका, मगही ,भोजपुरी,मैथिली, गढ़वाली इत्यादि।
देखा जाए तो देवनागरी लिपि का प्रयोग विभिन्न भाषाओं को जोड़ने और सांस्कृतिक एकता बढ़ाने में भी सहायक है। यह ध्वन्यात्मक लिपियां रोमन, अरबी ,चीन आदि में सबसे अधिक वैज्ञानिक भी है।
प्रसिद्ध भाषाविद सर विलियम जॉन्स का कथन है ,
“देवनागरी किसी भी लिपि की तुलना में अधिक वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित लिपि है।”
फिर तो हम हिंदी भाषी लोग हैं, जो देवनागरी की महत्ता को नहीं समझ रहे। हम अपनी हिंदी को उसकी देवनागरी लिपि से दूर करने में लगे हैं। यह न तो हमारे हित में है और न ही हमारी सहज और सरल भाषा हिंदी के हित में।
इसलिए हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा और हिंदी मास मनाते हैं तो हम प्रण करें कि देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करेंगे। यदि हम अपनी भाषा और अपनी लिपि को याद रखते हैं तो हम अपना जज्बा और सम्मान भी कायम रखते हैं।
- शेफालिका सिन्हा
रांची, झारखंड।
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