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हिन्दी दिवस के अवसर पर, अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की दिल्ली इकाई की काव्य-चौपाल सम्पन्न


 

हिन्दी दिवस के अवसर पर, अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की दिल्ली इकाई की काव्य-चौपाल सम्पन्न

दिल्ली । हिन्दी दिवस के अवसर पर, अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की दिल्ली इकाई की काव्य-चौपाल शुक्रवार दिनाँक १२ सितम्बर २०२५ को  गूगल मीट पर आयोजित की गई। यह काव्य- चौपाल डॉ. संतोष श्रीवास्तव जी की विशेष उपस्थिति और शकुन्तला मित्तल जी की अध्यक्षता में हुई। इस काव्य- चौपाल में  प्रतिभागियों ने अपनी मौलिक रचनाओं और विचारों से हिन्दी दिवस का आगाज़ किया।

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की संस्थापिका और कार्यक्रम की विशेष अतिथि संतोष श्रीवास्तव ने संस्था की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि,  *हिन्दी की भारतीय भाषाओं में अनिवार्यता* विषय पर अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की सात इकाईयों की एक साथ गोष्ठी होगी, जिसमें तीन हिन्दी भाषी लेखकों को सम्मानित किया जाएगा। संतोष श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में पुस्तकों की प्रूफ रीडिंग के दौरान दिखने वाली व्याकरणिक अशुद्धियों की तरफ़ भी ध्यान खिंचवाया।

चंचल हरेंद्र वशिष्ठ जी ने सुमधुर स्वर में सरस्वती वन्दना गा कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। सुषमा भण्डारी जी के स्वागत वक्तव्य ने सभी का मन मोह लिया। सुषमा भण्डारी जी ने भाषा को बहता नीर बताते हुए अपनी रचना में हिन्दी के उद्भव और विकास को बहुत ही सुन्दर ढ़ंग से उतारा है।

                  विश्व पटल पर छा रहा

                   हिन्दी का वर्चस्व

                   गंगा सी यह पावनी

                   भरा हुआ ओजस्व

                   हिन्दी जान हमारी

                    है यह दुनिया पर भारी...

उमंग सरीन जी ने घर के सभी बुजुर्गों पर समर्पित अपनी सुमधुर आवाज़ में गीत सुनाया।

               हम हैं बरगद हम हैं पीपल

                रामा श्यामा तुलसी हम

                 हम भी माटी से बंधे हैं

                 माटी में मिल जाने वाले...

सरिता गुप्ता जी ने मातृ भाषा हिन्दी के सम्मान में लिखा,

                  आधे अक्षर का यहाँ,है पूरा सम्मान

                   इसलिए हिन्दी रही,सबसे उच्च महान

उनकी कविता की यह पंक्तियां दृष्टव्य हैं - 

      मिल - जुल कर हंस लीजिए,जीवन के दिन चार

       जिम्मेदारी तो सदा,सिर पर रहे सवार।

डॉ. अंजू अग्रवाल 'उत्साही' जी ने अपनी कविता में हिन्दी को हमारी सभ्यता, हमारा संकल्प और संस्कार बताया।उद्धृत है - 

            ' आन,बान,शान,मान 

              सबका है सम्मान हिन्दी ' 

कवियत्री सुरेखा जैन ने हिन्दी को सम्पर्क भाषा बताते हुए अपनी रचना में उद्धृत किया कि,

   कौन कहता है कि माँ भारती का श्रृंगार अधूरा है

   कर ले तू सद् संकल्प तो यह आज ही पूरा है।

अंजू क्वात्रा ने अपने माहिए में बहुत ही ख़ूबसूरत 

अंदाज़ में यह बात कह दी,

     " सच को मैंने सच कहा

      अब ज़माने की नज़र में,

       यह हिमाकत है तो है"

आगे देखिए - 

       "दिल के रिश्तों को समझने के लिए

         दिल के रिश्तों को समझने की ज़रूरत 

                         है तो है"

दिव्या सिंह ने अपनी मौलिक रचना सुना कर श्रोताओं का मन मोह लिया।

संतोष बंसल ने " हिन्दी भाषा भारतीयता की भाषा" विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए कि, 

"आजकल हिन्दी लेखन में रोमन लिपि का प्रचलन बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है,उक्त सन्दर्भ में लेखिका कहती हैं कि, हिन्दी भाषा भारतीयता की भाषा है अतः हिन्दी लेखन में देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करना चाहिए..."

डॉ. कविता सिंह प्रभा ने अपनी रचना "मैं हिन्दी हूँ " 

सुना कर सभी का दिल जीत लिया। उनके शब्दों में,

 "जन मानस की अभिव्यक्ति हूँ, मैं हिन्दी हूँ 

   मौलिकता में मैं प्रवीण हूँ, मैं हिन्दी हूँ 

    बहुत सरल और अर्थ पूर्ण हूँ, मैं हिन्दी हूँ "

आभा कुलश्रेष्ठ ने बहुत ही बेबाक और स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अपनी रचना के माध्यम से रखी,

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि,

     "वह देश स्वयं मिट जाता है

       जिसकी कोई पहचान नहीं

       हिन्दी दिवस मनाना भी

       मन को पीड़ा दे जाता है..."

आगे वह प्रश्न करती हैं, कि,

        "है कोई देश ऐसा भी जो

          भाषा सप्ताह मनाता है?"

उनके अनुसार ,

       "हिन्दी को यदि युवा हृदय में बसाना है

         तो उसे रोजी - रोटी की भाषा बनाना है..."

भावना शुक्ला ने अपने दोहों और मुक्तक से श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध कर दिया।उनकी रचना से उद्धृत पंक्तियाँ इस प्रकार से हैं - 

   "हिन्दी हिंदुस्तान की, करे दिलों पर राज।

     चमक रहा है भाल पर, है बिंदी का ताज।।"

डॉ. शुभ्रा ने हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार और उसे वैश्विक भाषा बनाने में, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस A I के प्रयोग और उपयोग पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उनके अनुसार, "...आज के इस तकनीकी और digitalization के युग में हम इस परिवर्तन की आंधी को सहज स्वीकार करें और इसे हिन्दी भाषा के प्रचार एवं प्रसार का हिस्सा बनायें।"

कवयित्री रेणु रतन मिश्रा ने अपनी रचना में हिन्दी के मान और सम्मान को बढ़ाने की बात कही,

      "हिन्दी का हम मान बढ़ाएं।

        इसका नित सम्मान बढ़ाएं।।

         हिन्दी भारत की भाषा है।

         नवयुग की बस यह आशा है।।" 

आशमा कौल ने अपनी रचना के माध्यम से हिन्दी को राष्ट्र का अभिमान बताया।अपनी दूसरी रचना में नारी सशक्तिकरण की आवाज़ बुलन्द करते हुए लिखा कि,  "औरत तुम्हें मालूम ही नहीं कि क्या हो तुम..."

डॉ. दुर्गा सिन्हा 'उदार' ने अपनी रचना में, हिन्दी को हर भाव की भाषा और विश्व ऐंक्य की भाषा बताते हुए सर्जना की है।

        " चिन्तन - मनन, कल्पना - सर्जन

            हिन्दी है हर भाव की भाषा

           पावन,पुनीत, पुष्पित - पल्लवित

            हिन्दी सरसरि गान की भाषा

            सरल है सहज,कोमल - मोहक है

            हिन्दी निज पहचान की भाषा..."


डाॅ सुधा कुमारी जी ने हिंदी लेखकों, मीडिया और पत्र पत्रिकाओं को अति उर्दू प्रेम या अंग्रेजी के अंधानुकरण से बचना चाहिए। संस्कृत को राजमाता की जगह पर रहना चाहिए और हिंदी साम्राज्ञी की तरह राज करे, यही श्रेयस्कर होगा। हमसब गर्व से हिंदी का प्रयोग करें और इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करें।

डॉ. वनीता शर्मा ने हिन्दी भाषा के सम्मान पर अपनी रचना में निम्न पंक्तियाँ लिखीं - 

       "आज विश्व फलक पर हिन्दी का सम्मान है

          सकल विश्व में उसका मान - सम्मान है"

अन्य कविता में से उद्धृत पंक्तियाँ हैं - 

    "अभिनन्दन हिन्दी भाषा का,प्रमुदित सकल दिशाएं हैं

      मुदित हृदय है जनमानस का, प्रफुल्लित आज फ़िज़ायें हैं"

गीतांजलि गुप्ता ने अपने दोहों और मुक्तक से सबका मन मोह लिया।

     "हिन्दी भाषा में छपा शब्दों का भण्डार 

       उर्दू हो या फ़ारसी करती सबसे प्यार

       एक दिवस से है नहीं हिन्दी की पहचान

       हर दिन इनका राज है जाने सब संसार"

डॉ. प्रवीण शर्मा 'कश्यप' जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि, हमें अपनी संकुचित विचारधारा को त्याग कर आगे बढ़ना होगा। डॉ.प्रवीण शर्मा ' कश्यप' जी ने कार्यक्रम का संचालन भी बहुत ही कुशलतापूर्वक किया।

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की महा - सचिव अर्चना पांड्या जी ने स्वरचित ग़ज़ल पेश कर कार्यक्रम को और भी सरस बना दिया।

 "पानी में कभी कोई कहां तस्वीर बनती है

   बिना हिम्मत बिना मेहनत कहां जागीर बनती है..."

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की दिल्ली ईकाई की अध्यक्ष 

शकुन्तला मित्तल ने अपनी रचना कुछ इस प्रकार से प्रस्तुत की,

       "हिन्दी को समझना

         इतिहास को पढ़ना है

         संवेदना को सुनना है

         और एक समूची सभ्यता को

          अपनी ही वाणी में अनुभव करना है..."

वन्दना रानी दयाल ने अपनी स्वरचित ग़ज़ल प्रेषित कर कार्यक्रम के माहौल को ख़ुशनुमा बना दिया।

कार्यक्रम में पुष्पा सिन्हा,सरोज गुप्ता,अंजना गर्ग , राधा गोयल,  अंजु दुआ जैमिनि  भी उपस्थित थीं। 

कार्यक्रम के अंत में रेणु मिश्रा ने मंच पर उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

इस प्रकार स्नेहिल अभिनन्दन के साथ प्रारम्भ हुआ यह कार्यक्रम विदुषियों की रचनात्मक ऊर्जा के प्रवाह में बहता हुआ मधुरिम आभार और धन्यवाद ज्ञापन के साथ सम्पन्न हुआ।जिसकी मधुर यादें हमारे कवि हृदय को ऊष्मित कर रहीं हैं।


                    डाॅ  शुभ्रा

              द्वारका दिल्ली

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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