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जीवन ,रिश्तों और उनके अंतर्द्वंदों की संवेदनशीलता है शिवानी के कहानी संग्रह - ' मुड़ी हुई पर्चियां' में -श्रीमती शोभा शर्मा,छतरपुर


 समीक्षा : 

जीवन ,रिश्तों और उनके अंतर्द्वंदों की संवेदनशीलता है शिवानी के कहानी संग्रह - ' मुड़ी हुई पर्चियां' में

यह लेखिका का प्रथम कहानी संग्रह है।

कवर आकर्षक, कागज की मोटाई एवं क्वालिटी अच्छी, छपाई का फॉन्ट मनभावन, आँखों को सुकून देने वाला है।

कहानी संग्रह में कुल अठारह कहानियों का समावेश है। 

हिंदी कथा संसार में शिवानी 'शांतिनिकेतन' अपने कहानी संग्रह के साथ प्रवेश कर रहीं हैं।

कहानियों में जीवन की, रिश्तों और उनके अंतर्द्वंदों को पूरी संवेदनशीलता से उकेरा गया है।भाषा सहज, सरल, प्रवाहमय, बांधने वाली,  पठनीय और मर्म को स्पर्श करने वाली हैं। कहानियों के शीर्षक सुंदर हैं।

लगभग सभी कहानियों में भाव प्रवणता, गहरा चिंतन है जो सामाजिक ढांचे से अलग हैं।

लेखिका ने अपनी कहानियों की प्रेरणा आसपास के जीवन से ली है। 

देशी विदेशी पात्र, विसंगतियों से रूबरू होते कभी वापस लौट आते हैं, कभी प्रेमी विदेश जाकर प्रेमिका को विछोह देता है तो कभी वहाँ कोई लड़की जा फंसती है।

समाज की विसंगतियों से दो चार होती, इन कहानियों की नायिकाएँ अपने-अपने ढंग से निर्णय लेतीं हैं और सोच, एवं व्यवस्था से परे, अनपेक्षित सुखद अंत पाठकों के समक्ष आता है। 

इसकी कहानियों के कथानक, पात्र, भाषा-शैली सुंदर है।

सरल सहज प्रभावी संवाद और कहानियों के उद्देश्य जैसे तत्वों का भलीभांति मूल्यांकन हुआ है।

किसी कहानी में स्त्री हृदय की वेदना उद्घाटित हुई है तो किसी में समाज की समस्या को लेकर उसका समाधान प्रस्तुत किया गया है।

प्रथम कहानी *रईस ग्राहक* से शुरूआत की गई है। एक ग़रीब मातृपितृविहीन किशोरी जीवन के क्या क्या रंग देखती है! पाठकों का मन द्रवित हो उठेगा। अंत तक पढ़ें जरुर।

*नक्कालों से सावधान*

कृष्ण जैसे मित्र से मुलाकात और वृद्धावस्था की व्यथा को लेकर यह कहानी लिखी गई है।

*मिट्टी के खिलौने*

कहानी में गांव और शहर के कारोबार में, लोगों में सोच का फर्क एवं बालमन का चित्रण/ चिन्ह्ति किया गया है। पढ़िए आगे क्या हुआ!

*अरमानों का संदूक*

कहानी सुनीता के अधूरे अरमानों की कथा कहते हुए नजर आती है, पर जब उसके बेटे बहू को जानकारी लगती है तो क्या वह संदूक खुल पाता है? सुनीता के क्या अरमान थे जो एक लंबे अंतराल तक अधूरे ही रह गए थे। इसे जानने के लिए पूरी कहानी अवश्य पढ़िए।

हो सकता है कि वे आपके आसपास के ही किसी जानने वाले के अधूरे अरमानों की कहानी हो।

*वह प्यार में थी*

संदेश परक कहानी। कि किशोरावस्था से ही जो लड़किंया अपने मातापिता परिवार की इज्जत के बारे में न सोचकर, प्यार के नशे में डूब जातीं हैं तो उनमें से कितनों की जिंदगी संवरती है? यदि नहीं संवर पाती है तो उनका क्या हश्र होता है!! ऐसी ही एक किशोरी मिनी को प्यार हो जाता है।

*आखिरी पन्ना* एक अच्छी कहानी है। कथानक में आधुनिक सोच का समावेश है। जज जहां अधिकांश पुरुष अपनी पत्नी के अनायास मिल गए प्रेमी को जरा भी बर्दाश्त नहीं कर पाते और पत्नी को सीधे ही या अपरोक्ष रूप से प्रताड़ित करने का कोई भी अवसर नहीं चूकते। 

वहीं अनिकेत गरिमा और रोहित के त्रिकोण में गरिमा का पति क्या निर्णय लेता है? गरिमा की डायरी के आखिरी पन्ने में किसने लिखा था? और क्या लिखा था जिसे पढ़कर गरिमा सन्न रह गई। कथाकार ने इस त्रिकोण तथा कहानी में आए मोड़ का अंत सकारात्मक किया या नकारात्मक? घर परिवार बिखर गया या बचा?

*मानसिक विकलांगता*

कोई शरीर से विकलांग होता है तो कोई विचारों से, सोच से, मन से, स्तर से, संस्कारों से विकलांग होता है। हालांकि यह लघुकथा ही है पर प्रेरणादायक कहानी है पढ़िए जरूर।

कुछ अन्य कहानियां 

*सपनों के पंख*

*सुहाग की साड़ी*

*अंतिम विदाई*

*पुए मठरी*

*ये कैसा प्यार*

*दूध का धोवन*

*सरला का परपंच*

*खरीदी हुई जिंदगी*

*नया सवेरा*

*जीवन अभी बाकी है*

अपेक्षिकृत छोटी कहानियां है मगर पढ़ने योग्य हैं। कहन और वाक्यविन्यास बढ़िया है। यदि इन कहानियों की और गहराई तक पड़ताल की जाती तो संग्रह यादगार बन जाता।

पाठकों को इनमें जीवन को सार्थक बनाने वाले अनेक अच्छे संदेश मिलेंगे।

शीर्षक कहानी *मुड़ी हुई पर्चियां* दर्द में डूबी हुई एक ऐसी सहनशील मां की कहानी है जो भरी पूरी गृहस्थी वाले दो बच्चों की मां है, पर ऐसी बहुत सारी मांओं की तरह, वह अपनी तनहाईयों से लड़ती/ जूझती स्वयं को अकेलेपन की अंधेरी सुरंगों में पाती है। इससे ज्यादा कहानी को रिवील नहीं किया जा सकता। 

मां की भावनाओं को जानने के लिए कि आगे क्या क्या हुआ?

पाठकों को कहानी को अंत तक पढ़ना पड़ेगा और जाहिर है कि  ऐसे वृद्धों/बुजुर्गों के लिए कुछ अच्छा सा हल/समस्या का समाधान भी मिलेगा।

संग्रह पेपरबैक में है। फांट पठनीय है। 100 पृष्ठ संख्या के हिसाब से किताब कुछ पतली सी लगती है। 

छोटी बड़ी कहानियों में क्रमबद्धता नहीं हैं जो कि एडीटिंग का मसला है। बड़ी कहानियां सिलसिलेवार पहले होनी चाहिए थीं। कभी लघुकथा आ जाती है तो कभी लंबी कहानी आ जाती है।

जिस शीर्षक से किताब का नाम रखा गया वह मध्य में न होकर, प्रारंभ में होती तो संग्रह की सार्थकता बढ़ जाती।

इसके बाद सारी लघुकथाओं को एक साथ रखा जाता।

कुछ कहानियों के कथानकों में नवीनता न होते हुए भी और पाठक को क्लाईमैक्स का अनुमान होते हुए भी, कहानीकारा ने अपनी सरल प्रवाहमय शैली से जिज्ञासा बनाए रखी, पाठक को अंत तक बांधे रखा। वह सराहनीय है। कुछ संस्मरणात्मक कहानियां भी हैं। कुछ में सपनों को प्रेषित किया गया है लेकिन इनमें जीवंतता और दृश्यात्मकता भी है।

शिवानी एक उभरती हुई युवा लेखिका हैं। ये अपनी प्रतिभा को और मांजें तो बहुत आगे तक जाएंगी। 

आप वैसे तो विगत अनेक वर्षों से लेखन कर रहीं हैं और देश विदेश के पत्र पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रहतीं हैं। पर प्रकाशित संग्रह पुस्तक के रुप में प्रथम कृति है।

*मुड़ी हुई पर्चियां* कहानी संग्रह पाठक को स्त्री विमर्श के अनेक आयाम देते हुए सामाजिक संबंधों, जिंदगी की कशमकश को समझने के अवसर देता है।

मैं आग्रह करूंगी पाठकों से कि यह कहानी संग्रह पढ़ें नवयुवा लेखिका को प्रोत्साहन देते हुए जीवन के अप्रत्याशित मोड़ों पर होने वाली कशमकश से रूबरू हों और इसमें दिए गए संदेशों को आत्मसात करें।

 कहानीकार को असीम शुभकामनाएं एवं बधाईयां देती हूं। आप साहित्याकाश पर चमकें यशोभागी बनें। हम सभी को उनकी अगली किताब की प्रतीक्षा रहेगी।

 पुस्तक -

*मुड़ी हुई पर्चियां*

लेखिका कहानीकार- *शिवानी शांतिनिकेतन*

पेज संख्या-101

प्रखरगूंज पब्लिकेशन रोहिणी, दिल्ली

मूल्य 395 रु. 


- श्रीमती शोभा शर्मा

उपन्यासकार, कहानीकार, कवियत्री, संपादक, आकाशवाणी कलाकार

छतरपुर म. प्र.

मो. 9993238113



देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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