बराबरी
घुमंतू उस शाम शहर के एक नए कैफे में चाय पीने नहीं, युवाओं की सोच पीने पहुँचा था। वही कैफे जहां वाई-फाई मुफ्त था, लेकिन रिश्ते अक्सर खर्चीले साबित होते थे।
वहीं एक कोने में बैठे थे रवि और आशना — स्मार्टफोन से ज़्यादा स्मार्ट सोच वाले, और आज के रिश्तों को “50-50 पार्टनरशिप” में जीने वाले।
घुमंतू की आँखें और कान दोनों अब भी चोकस थे। वह पास वाले टेबल की कुर्सी पर बैठ गया।
रवि बोल रहा था,“देखो यार, रिलेशनशिप में सब बराबर होना चाहिए — बिल भी आधा, काम भी आधा, स्पेस फुल। मैं तुम्हें कंट्रोल नहीं करता, तुम मुझे मत करना। नो इमोशनल ड्रामा।”
आशना मुस्कुराई, “बिलकुल! और मैं तुम्हारे हर मैसेज का जवाब दूँ, ये ज़रूरी नहीं। ना मैं कोई बीवी हूं, ना तुम कोई हसबैंड!”
घुमंतू अब तक अपनी चाय के कप को ऐसे घूर रहा था जैसे वह उसमें रिश्तों का स्वाद खोज रहा हो। वह धीमे से बोला,
“बिल और बातें बांटना आसान है बेटा, पर क्या तुम तकलीफें भी बराबर बाँट सकोगे?”
रवि थोड़ा चौंका। “सर, हम तो बराबरी की बात कर रहे हैं।”
घुमंतू मुस्कराया, “मैं देख रहा हूँ, लेकिन तुम्हारी बराबरी बड़ी नाप-तौल वाली है। जहाँ सुविधा मिली, वहाँ बराबरी। लेकिन जहाँ समझ, सहनशीलता और त्याग की बात आएगी, वहाँ कौन आगे बढ़ेगा?”
आशना थोड़ी गंभीर हो गई। “आप क्या कहना चाह रहे हैं?”
“बेटी, सच्ची बराबरी तब होती है जब कोई बीमार हो तो दूसरा बिना पूछे दवा रख दे। जब करियर की दौड़ में एक रुके, तो दूसरा उसके सपनों की रेस पूरी करे। जब बोलने का मन न हो, तो चुप्पी में भी साथ हो।”
रवि ने गर्दन झुका ली, “हमने कभी ऐसे सोचा नहीं…”
“सोचना जरूरी नहीं, समझना जरूरी है,” घुमंतू ने कहा, “आजकल के रिश्ते टूटते नहीं, फिसलते हैं — क्योंकि वो बराबरी को हिसाब की तरह जीते हैं, एहसास की तरह नहीं।”
चाय खत्म हो गई थी। रवि ने आगे बढ़कर अपनी कैटल से घुमंतू का कप भरना चाहा।
घुमंतू मुस्कराया, "बस बेटा......"और उठ कर चल दिया।
पर रवि और आशना के लिए बहुत कुछ सोचने को छोड़ गया।
- डॉ अंजना गर्ग , दिल्ली
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