काव्य :
करवा चौथ
नारी तेरी अजब कहानी, तुने हार कभी नहीं मानी।
यमराज को भी मनवाकर,बचाई सुहाग की जिंदगानी।
सत्यव्रत सावित्री की कहानी,आज भी सुनाई जाती।
करवा चौथ के व्रत की महिमा,आज भी मनाई जाती।
सूर्योदय से पहले स्नान करके, गणपति की पूजा करती।
सोलह श्रृंगार मे सज धजकर, चरगी खाकर व्रत करती।
निर्जला उपवास तु करती,मन को खुशियों से भरती।
लंबी उम्र हो अपने पति की, यही मंगल कामना करती।
आंँखों में कजरा,बालो में गजरा,कानों में बालि, होंठों पर लाली।
हाथों में मेहंदी,माथे पर बिंदी,लाल लाल जोड़े की बात निराली।
गले में मंगलसूत्र, पांँवों में बिछिया,हाथों में कंगन, पांँवों में पायल।
पूजा थाल सजाएं छत पर आती,देख अप्सरा चांँद हो जाए घायल।
चांँद को देख खुश हो जाती,छलनी में दीप जलाती।
चांँद को दीप दिखाकर,छलनी से पति दर्शन करती।
शिव पार्वती का आशीर्वाद,सात जन्म रहे साथी मेरा।
पति के हाथ से पानी पीकर, निर्जला व्रत पूरा करती।
कितना पवित्र मन नारी का,करवा चौथ का व्रत करती।
ख़ुद भूखी रहकर मुथा,पति के लंबी उम्र की दुआ करती।
- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव, मुम्बई
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