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लघुकथा : गलतफहमी - डॉ मंजू लता , नोयेडा


 

लघुकथा : 

गलतफहमी

       दिन ढल चुका था। आकाश में धुंधलका छाया हुआ था। रति घर को ठीक करने में मशगूल थी। पति के आने के पहले वह घर को करीने से व्यवस्थित कर देती थी। यह उसके दिनचर्या में शामिल था।

      अचानक से फोन की घंटी बजने लगी थी।रति ने उठाया, पूछा---"कौन?कौन बोल रहे हैं? "

उधर से पुरूष आवाज़ -----"मैं--मैं निर्मल"

रति (अनमनी सी होती हुई)-----"अरे निर्मल!कहो कैसे याद किया"

निर्मल-----"ऐसे ही तुम्हारी याद आ गई थी। मैं दफ़्तर के कार्य से तुम्हारे शहर आया हुआ हूँ। क्या मैं तुम से मिल सकता हूँ।? "

रति----(कुढ़ते हुए) हाँ--हाँ, क्यों नहीं। आ जाओ। "

मन ही मन बुदबूदाती है-----"गड़ा मुर्दा फ़िर से उखाड़ने आ रहा है "

             दो घंटे बाद कालवेल बजती है। रति दरवाजा खोलती है।

रति अपने मनोभावों को छिपाते हुए----"अरे  निर्मल!आओ --आओ बैठो।

"क्या लोगे ठंढा या गरम?"

निर्मल----" बस एक ग्लास पानी " मैं तो यूँ ही तुम्हें देखने आ गया था। तुम सुख से हो या नहीं। निश्चय ही तुम्हारे पति संभ्रान्त व्यक्ति हैं।

तुम्हारे चेहरे की चमक बता रही है कि तुम सुखी और सम्पन्न हो।

रति---"हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती।

              मन में गुस्सा करती हुई पानी लाने रसोई घर में जाती है। सोचती जाती है कि कैसे इसने सारे सपने तोड़े थे। सिर्फ़ अमेरिका जा कर अपना कैरियर बनाने के लिए। शायद अब मुझ पर तोहमत लगाएगा कि मैंने उसका इंतजार क्यों न

किया। उसे क्या पता कि निम्न मध्यम वर्ग में

जन्मी कन्याओं की विवशता क्या होती है। माता-पिता का दबाव और उनकी परेशानी, समाज का दवाब। बढ़ती उम्र के ताने। "बूढी हो चली है अभी तक कंवारी है।"

फ़िर निर्मल ने ख़त से भी तो आश्वाशन नहीं दिया था, जिससे आशा कुछ बंधती।

रति----हाथ में पानी पकड़ाते हुए-----" अपनी सुनाओ!पांच साल हो गए कालेज छोड़े हुए। पत्नी कहाँ है?"

निर्मल----"मैंने विवाह नहीं किया। "

रति----"क्यों? "

निर्मल----"ऐसे ही "

रति----"अब तो डॉक्टर बन गए हो? "

निर्मल ----"सो तो सही है।इंसान के सारे सपने कब पूरे होते हैं। हाँ! माता-पिता के सपने को मैंने पुरा किया।"

रति----"ये सब बहाने हैं। सच--सच बताओ अभी तक विवाह क्यों न किया? "

निर्मल----"किसी एक को मैंने अपने दिल में सर्वदा के लिए बिठाया था। दूसरी कोई भाती नहीं। अब जो विवाह करूँ तो वह समझौता पर आधारित होगा, जिसके पक्ष में मैं कभी न था। मैं किसी कन्या के साथ नाइंसाफी नहीं कर सकता। विवाह सिर्फ़ शरीर का ही नहीं दो आत्माओं का मिलन है" भवावेश में वह बोलता गया.

रति सब समझ रही थी। उसके पास कोई उत्तर नहीं था। मन ही मन सोचती रही------

काश!कुछ दिन और उसने इंतजार कर लिया होता। परिवार और समाज के तानों को सह लिया होता।

अपने मन में उठते जज्बातों को निर्मल के समक्ष जाहिर नहीं होने दिया।

          निर्मल जाने को उठा। रति ने ठंढे मन से विदा किया। दूर तक वह उसे जाते हुए देखती रही।

 - डॉ मंजू लता , नोयेडा

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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