काव्य :
लोग अपनों को जब सताते है
///////////////पूर्णिका//////////
लोग अपनों को जब सताते है।
खुद भी सुख चैन कहां पाते है।
जो भी बोओगे वह ही पाओगे,
बात यह भी ,न समझ जाते है।
वादा करके है भूलना फितरत,
वादा करके कहां निभाते है।
दर्द देना कभी न ,अपनों को,
काम ईश्वर को ये न भाते है।
लोग,ईश्वर को वह बहुत भाते,
खुदके दुख में जो मुस्कुराते है।
याद निर्मल करो,उन्हें दिल से,
अच्छा करके जो भूल जाते हैं।
- सीताराम साहू'निर्मल'छतरपुर मप्र
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