लघुकथा :
डिनर सेट
अप्रैल की बात है तय हुआ कि घर की थोड़ी सजावट की जाए परदे बदले गए , कुछ खिट -पिट हुई , तो कोई वस्तु देखकर बीता वक़्त याद आया| अब बारी थी उस क्षेत्र की , जिसकी सफाई के नाम से बड़ा से बड़ा मेहनती व्यक्ति डरता आया है , “किचन”!! फिर भी जैसे तैसे कुछ घंटों में सब रिसेट किया गया| एक बहुत उत्तम निष्कर्ष निकला कि हमें नए डिनर सेट की सख्त जरुरत है | एलीट , सफ़ेद , सिरेमिक का जिसमे रोज़ का खाना मास्टर शेफ की प्लेट लगे |
मॉल और स्टैंडअलोन स्टोर्स का मोह त्याग हम सपरिवार शहर की छोटी दुकानों में गए | दगडुशेठ हलवाई गणपति के दर्शन किए , वहाँ मिलने वाले विशेष व्यञ्जनों का अनिवार्य रसस्वादन हुआ | जो लेने आये थे वो छोड़कर बहुत कुछ ख़रीदा गया |
फिर एक जगह लगा कि यहाँ डिनर सेट टटोला जा सकता है | दुकान में एक १५-१६ साल का बालक था , उत्साही और कर्मठ | मालिक के इशारा करने पर उसने मुझे डिनर सेट दिखाना शुरू किये | मुझे एक न भाया | रंग चटक थे , गोल्डन रेखाएँ , लाल नीले बड़े फूल इत्यादि| मेरी पसंद का बारीक़ सादा सफ़ेद बेस का कुछ नहीं था| मैंने अपनी पसंद उसे बताई | वो लड़का तपाक से बोला , “ओह ! तो मैडम आप दिवाली के पहले आना | अप्रैल में लोग दुसरो को देने के लिए खरीददारी करते है , तो इस तरह का बजट वाला माल आता है| दिवाली में घर के लिए ख़रीदा जाता है , तो लोग प्रीमियम लेते हैं |
ग्राहक की सोच का ऐसा मनोविज्ञान का नमूना , कोई बड़ा मार्केटिंग हेड ही बता सकता था | मै मुस्कुराई और मेरे एम बी ए दिन याद करने लगी| कंज़्यूमर बिहैवियर पर बड़े लेक्चर होते थे , मोटी किताबें पढ़ाई जाती थी | पर किसी ने इस बालक की तरह एक पंक्ति में इतना बड़ा पाठ इतनी सरलता से नहीं पढ़ाया | उदर तृप्ति के डिनर सेट लेने गयी थी , ज्ञान प्राप्ति हुई |
- जूही गुप्ते , पुणे
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