पुस्तक समीक्षा : संदूकची भावनाओ एवम् यथार्थ का अनूठा संगम
यह संग्रह “संदूकची (Sandookchi)” – रजनी प्रभा का कविता-संग्रह है, जिसमें आधुनिक जीवन, संवेदनाओं और स्त्री-अस्तित्व के विविध रंग झलकते हैं।
रजनी प्रभा का यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि अनुभवों का वह “संदूक” है जिसमें समय, समाज, रिश्ते और आत्मा के उतार–चढ़ाव सहेजे गए हैं। इस पुस्तक की कविताएँ मानो जीवन के हर पहलू को छूती हैं — गाँव की मिट्टी से लेकर आधुनिकता के चकाचौंध तक, माँ के आँचल की ऊष्मा से लेकर नारी के आत्मसंघर्ष तक।
कवयित्री ने भाषा को अत्यंत भावपूर्ण और सहज बनाए रखा है, जिससे पाठक सीधा उनके मनोभावों से जुड़ता है। उनकी अभिव्यक्ति में संवेदना की गहराई, विचार की प्रखरता, और शब्दों की सौम्यता एक साथ मिलती है।
संग्रह की कविताएँ जैसे “गाँव शहर हो रहा है”, “आधुनिक दंश”, “स्त्रीत्व”, “साथी साथ निभाना” और “अंतर्मन की वेदना” — समाज के बदलते स्वरूप पर तीखा किन्तु संवेदनशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। वहीं "दादी माँ”, “पिता”, “बदलाव”, “यादें” जैसी रचनाएँ रिश्तों की आत्मीयता और स्मृतियों की लय को उभारती हैं।
रजनी प्रभा की लेखनी में स्त्री-मन का अंतर्द्वंद्व, उसकी लाचारी नहीं बल्कि उसकी चेतना, उसका आत्मबल और उसका प्रेम बोलता है। उनकी कविताएँ बताती हैं कि नारी केवल करुणा नहीं, बल्कि सृजन की ऊर्जा और परिवर्तन की धारा है।
पुस्तक का शीर्षक “संदूकची” प्रतीक है — उस हृदय-संदूक का जिसमें कवयित्री ने जीवन के सपनों, स्मृतियों और संघर्षों को सहेजा है। हर कविता इस “संदूक” की एक परत खोलती है, और पाठक को भीतर झाँकने पर मजबूर करती है।
समीक्षक दृष्टि से निष्कर्ष :
यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक उल्लेखनीय योगदान है। इसमें जहाँ लोक-जीवन की गंध है, वहीं आधुनिक चेतना का आकाश भी है।
रजनी प्रभा ने सिद्ध किया है कि कविता केवल भाव नहीं, विचार और जीवन-दर्शन का विस्तार भी है।
संक्षेप में — “संदूकची” एक संवेदनशील हृदय की सजीव यात्रा है, जो पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।
लेखिका एवम् साहित्यकार
शिखा गोस्वामी "निहारिका"
छत्तीसगढ़
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