काव्य :
कहां गया परिवार
रिश्ते नाते ढह रहे
निकल रहा सब दम
ऐसे परिवर्तन हुए
ना वैसे रहे अब हम
सुखी सभी हम रहते थे
होता था बड़ा परिवार
बेटे,बेटी,नाती,पोते सब
पाते थे दादा,दादी का प्यार
हाय सभी कुछ सिमट गया
घर हुए सूने सब मिट गया
*हम* टूट गया, सब हुए *मैं*
खेले बच्चा किससे,हुआ एकाकी मैं
परिवार नियोजन हाय ये कैसा
सब चाहें बस पैसा पैसा
*ब्रज*,पति पत्नी में है अभाव विश्वास का
अब स्वान में ढूंढते हैं भाव,प्यार का
- डॉ ब्रज भूषण मिश्र , भोपाल
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उम्दा बहुत उम्दा
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