काव्य :
कहीं
कहीं खो न
जाऊँ
इन झील-सी
गहरी आँखों में
निगाहें चुराता हूँ
काजल की
गहरी लीक छूकर
ही निगाहें
लौटा लाता हूँ।
तुम तो मदिरा के
भर प्याले
लिए सामने आ
जाती हो
मदहोश न हो जाऊँ
कहीं
निगाहों से निगाह
टकराने से पहले
निगाहें
लौटा लाता हूँ।
चाहता बहुत हूँ
कजरारी
आँखों में छिपे
राज ढूँढ
अर्थ उनके
खोज लाऊँ
डर मगर लगता है
कि कहीं
इनकी भूलभुलैया में
मैं ही न खो जाऊँ
कहीं
तभी पलक-तट
छूआकर
निगाहें लौटा लाता
हूँ।
- डा.नीलम, अजमेर
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