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काव्य : कहीं - डा.नीलम, अजमेर


 काव्य : 

कहीं


कहीं खो न 

जाऊँ 

इन झील-सी

गहरी आँखों में

निगाहें चुराता हूँ

काजल की

गहरी लीक छूकर

ही निगाहें

लौटा लाता हूँ।


तुम तो मदिरा के

भर प्याले

लिए सामने आ

जाती हो

मदहोश न हो जाऊँ

कहीं

निगाहों से निगाह

टकराने से पहले

निगाहें 

लौटा लाता हूँ।


चाहता बहुत हूँ

कजरारी

आँखों में छिपे

राज ढूँढ

अर्थ उनके

खोज लाऊँ

डर मगर लगता है

कि कहीं

इनकी भूलभुलैया में

मैं ही न खो जाऊँ

कहीं

तभी पलक-तट

छूआकर

निगाहें लौटा लाता

हूँ।

    - डा.नीलम, अजमेर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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