पुस्तक चर्चा :
‘व्यंग्य—कल, आज और कल’ : हिंदी व्यंग्य का व्यापक परिप्रेक्ष्य और बौद्धिक पुनर्स्थापन
डॉ मुकेश गर्ग असीमित
हिंदी व्यंग्य पर उपलब्ध साहित्य में विवेक रंजन श्रीवास्तव की यह पुस्तक एक विशिष्ट और आवश्यक स्थान ग्रहण करती है। व्यंग्य को अक्सर एक हल्की-फुल्की, सहज और ‘मनोरंजन प्रधान’ विधा के रूप में देखा गया है, जबकि वास्तव में व्यंग्य साहित्य की सबसे गहन, सबसे तर्कशील और सबसे परिवर्तनशील विधाओं में से एक है। यह पुस्तक व्यंग्य को यथास्थान स्थापित करने का गंभीर प्रयास करती है, एक ऐसे अनुशासन के रूप में जो समाज, संस्कृति, भाषा और समय, इन सभी की क्रियाशील गतियों का सटीक पाठ करती है।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पाठक को व्यंग्य के इतिहास, उसके स्वरूप, उसकी सामाजिक अनिवार्यता और उसके भाषाई सांस्कृतिक विस्तार, इन सबमें बहुत सहजता से ले जाती है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि व्यंग्य की शक्ति उसकी चुटीली भाषा में नहीं, बल्कि उसके अंतर्निहित विवेक, बुद्धि और दृष्टि में होती है। व्यंग्य हमें केवल हँसाता नहीं; वह यह भी पूछता है, हम हँस क्यों रहे हैं? किस पर हँस रहे हैं? और हँसी के पीछे कौन-सा सामाजिक यथार्थ दबा है?
पुस्तक में हिंदी व्यंग्य के ऐतिहासिक विकास का जो क्रम प्रस्तुत किया गया है, वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रारंभिक जन परंपराओं की टटकी व्यंजना, रीतिकाल के उलटबाँसी विन्यास, भारतेंदु युग की सामाजिक चेतना, और आधुनिक युग के राजनीतिक सांस्कृतिक परिवर्तनों के बीच व्यंग्य की संवेदनशील यात्रा को लेखक ने बहुत संतुलन से रेखांकित किया है। इससे स्पष्ट होता है कि व्यंग्य किसी एक काल का साहित्य नहीं, बल्कि हर काल की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रतिक्रिया है।
व्यंग्यकारों पर की गई चर्चाएँ भी पुस्तक को समृद्ध बनाती हैं। यहाँ प्रशंसा और आलोचना का संतुलन दिखाई देता है, शरद जोशी की मानसिक सरलता में छिपी गहनता, हरिशंकर परसाई की वैचारिक स्पष्टता, आधुनिक व्यंग्यकारों की भाषा चातुर्य और विषय की विविधता सबका अत्यंत सारगर्भित मूल्यांकन मिलता है। लेखक किसी भी व्यंग्यकार को महिमामंडित करने की प्रवृत्ति से दूर रहते हुए यह दिखाते हैं कि व्यंग्यकार की प्रतिष्ठा का आधार उसकी शैली नहीं, उसकी दृष्टि होती है। यही दृष्टि समय के साथ बदलती है और व्यंग्य को जीवित रखती है।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह व्यंग्य को साहित्यिक विधा के साथ-साथ सामाजिक विज्ञान की तरह भी पढ़ती है। इसमें बार-बार यह उभरकर आता है कि व्यंग्य समाज का केवल दर्पण नहीं, बल्कि उसका विवेक है , वह विवेक जो व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करता है, राजनीति की धुंध को छाँटता है, और सामाजिक पाखंडों की परतें खोलता है। व्यंग्य की यह भूमिका आज के समय में और भी महत्त्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि मीडिया और बाज़ारवाद ने और भी जटिल विसंगतियाँ पैदा की हैं।
लेखक यह भी बताते हैं कि समकालीन व्यंग्य के सामने चुनौतियाँ कम नहीं हैं। सोशल मीडिया ने व्यंग्य को तात्कालिक बना दिया है। भाषा की सरलता और तत्क्षण प्रतिक्रिया का दबाव कई बार व्यंग्य की गहराई को कम कर देता है। राजनीतिक रूप से संवेदनशील वातावरण में व्यंग्यकार को आत्म–संयम और संवेदनशीलता, दोनों का पालन करना पड़ता है। फिर भी, इन चुनौतियों के बीच लेखक यह आशा व्यक्त करते हैं कि व्यंग्य का भविष्य उज्जवल है , बशर्ते व्यंग्यकार समाज-विमर्श की गंभीरता को बनाए रखते हुए भाषा की खेल भावना को जीवित रखें।
पुस्तक में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विमर्श महिलाओं के व्यंग्य लेखन पर प्रस्तुत किया गया है। हिंदी व्यंग्य–साहित्य में महिलाओं की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही है, परंतु जहाँ रही है, वहाँ उसने अत्यंत सूक्ष्म, अनुभव प्रधान और संवेदनशील दृष्टि प्रस्तुत की है। यह पुस्तक दिखाती है कि स्त्री अनुभव और व्यंग्य की दृष्टि जब एक साथ आती है, तो सामाजिक संरचना का नया और अधिक मानवीय पक्ष उभरकर सामने आता है।
अंत में, यह कहना आवश्यक है कि यह पुस्तक केवल व्यंग्य रुचि वाले पाठकों के लिए ही नहीं, बल्कि शोधार्थियों, साहित्य आलोचकों, अध्यापकों और उन सभी पाठकों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो हिंदी साहित्य की विधाओं को उनके सिद्धांतिक आधारों के साथ समझना चाहते हैं। पुस्तक का विश्लेषणात्मक ढाँचा स्पष्ट है, भाषा शोधपरक होते हुए भी सहज है, और उदाहरणों तथा संदर्भों का चयन अत्यंत संतुलित है।
‘व्यंग्य : कल, आज और कल’ व्यंग्य को उसकी संपूर्णता में समझने की दिशा में एक सशक्त और विश्वसनीय कदम है। यह पुस्तक व्यंग्य की परंपरा को पहचानते हुए उसके भविष्य की संभावनाओं की ओर भी संकेत करती है। हिंदी व्यंग्य को गंभीर साहित्यिक विमर्श में स्थापित करने के लिए यह कृति निश्चित रूप से एक लंबे समय तक संदर्भ ग्रंथ के रूप में देखी जाएगी।
समीक्षक –डॉ मुकेश असीमित
गंगानगर , राजस्थान

