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सूत्रधार साहित्यिक संस्था की 73 वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न


 

सूत्रधार साहित्यिक संस्था की 73 वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न 

हैदराबाद। सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, हैदराबाद, भारत की 73 वीं मासिक गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन स्मृति सभा के रूप में किया गया। संस्थापिका सरिता सुराणा ने समस्त सदस्यों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया और डॉ. मदनदेवी पोकरणा को इस गोष्ठी की अध्यक्षता करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया। उन्होंने बताया कि 25 दिसम्बर को वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.अहिल्या मिश्र के निधन से हिन्दी साहित्य जगत को जो अपूरणीय क्षति हुई है, उसको शब्दों में बयां कर पाना बहुत मुश्किल है। आज़ की हमारी गोष्ठी डॉ अहिल्या मिश्र की स्मृतियों को समर्पित है। स्वर साधिका श्रीमती शुभ्रा मोहन्तो ने निराला रचित सरस्वती वन्दना प्रस्तुत करके गोष्ठी का शुभारम्भ किया। तत्पश्चात् दो मिनट का मौन रखकर सभा द्वारा दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि दी गई।

सरिता सुराणा ने कहा कि डॉ अहिल्या मिश्र मेरी गुरु माँ रही हैं। हैदराबाद आने के बाद कादम्बिनी क्लब की सदस्यता लेने के बाद लगातार 22 वर्षों से उन्हें अहिल्या दीदी का सान्निध्य और मार्गदर्शन मिलता रहा है। उनके अचानक जाने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि माँ का साया सिर पर से उठ गया है। उन्होंने सूत्रधार संस्था के उद्घाटन समारोह, पुस्तक लोकार्पण समारोह से लेकर समस्त वार्षिक अधिवेशन और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष कार्यक्रम, सभी की अध्यक्षता की। उन्हें संस्था द्वारा सन् 2024 में 'गार्गी सम्मान' से सम्मानित किया गया। वे संस्था की त्रैमासिक ई-पत्रिका-'मंजरी' की परामर्शदात्री थीं। उनके जाने से जो रिक्त स्थान हुआ है, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। 

गोष्ठी में उपस्थित बिनोद गिरि अनोखा ने कहा कि उनके साथ मेरा सम्बन्ध माँ-बेटे जैसा था। जब भी गोष्ठी में मिलतीं तो भोजपुरी गीत की फरमाइश करतीं। तेलंगाना समाचार के सम्पादक के राजन्ना ने कहा कि वे उन्हें तब से जानते थे, जब वे दक्षिण समाचार में काम करते थे। जब उनकी आत्मकथा 'फांसी' का लोकार्पण हुआ तो मांजी के उद्बोधन से सभी भावविभोर हो गए। उन्होंने ही उनको लेखन के लिए प्रेरित किया। वरिष्ठ साहित्यकार दर्शन सिंह ने कहा रिटायर होने के बाद उन्हें किसी साहित्यिक संस्था की तलाश थी, जिसके संरक्षण में वे अपनी काव्य प्रतिभा को निखार सकें। इसी उद्देश्य से वे अहिल्या जी से मिले और इतने वर्षों के साथ में उनसे बहुत कुछ सीखा।

वरिष्ठ कवि गजानन पाण्डेय ने कहा कि हैदराबाद साहित्यिक जगत में अहिल्या जी का अपना विशिष्ट स्थान है और हमेशा रहेगा। उन्हें उनसे बहुत स्नेह और सम्मान मिला। वे कादम्बिनी क्लब की गोष्ठियों में नियमित रूप से आते थे। शुभ्रा मोहन्तो ने अपने अनुभव सुनाते हुए कहा कि वे कादम्बिनी क्लब के गठन के बाद तीसरी गोष्ठी से ही उनसे जुड़ी हुई हैं। तबसे लेकर आज तक वे प्रत्येक गोष्ठी में निराला रचित सरस्वती वन्दना - वर दे, वीणावादिनी वर दे प्रस्तुत करती आई हैं। अगर कभी वे नहीं आ पाती थीं तो अहिल्या जी की डांट पड़ती थी। शोभा देशपांडे ने कहा कि उन्हें दो दिन बाद पता चला तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि वे हमें छोड़कर चली गई हैं। वे हमेशा बुलाती रहती थीं और हम सबको आगे बढ़ाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। कटक, उड़ीसा से रिमझिम झा ने कहा कि भले ही वे वर्चुअल गोष्ठी के माध्यम से उनसे मिलीं लेकिन यह उनका सौभाग्य है कि वे इतनी बड़ी साहित्यकार से मिलीं और उनसे अपनी मातृभाषा में बात की। सरिता सुराणा ने उन्हें इन शब्दों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की - तिथियां आती रहेंगी/जाती रहेंगी/कैलेण्डर बदलते रहेंगे/साल-दर-साल/नहीं बदलेगा/यह अटल सत्य/जाने वाले लौट कर/नहीं आते/रह जाती हैं/सिर्फ स्मृतियां शेष।

डॉ. मदनदेवी पोकरणा ने कहा कि रत्नमाला साबू ने मेरा परिचय डॉ अहिल्या मिश्र से करवाया और धीरे-धीरे यह प्रगाढ़ दोस्ती में बदल गया। उन्होंने महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए बहुत काम किया। वे दबंग व्यक्तित्व वाली महिला थीं। किसी से डरती नहीं थीं और जो मन में ठान लिया, उसे पूरा करके रहती थीं। उनको साहित्य जगत में आगे लाने में अहिल्या जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है।सभा में उपस्थित सभी सदस्यों ने एकमत से इस बात को स्वीकार किया कि महिला सशक्तीकरण और समाज सेवा हेतु उनके द्वारा किए गए कार्यों के माध्यम से वे सदैव याद की जाएंगी। भले ही उनका भौतिक शरीर पंच तत्वों में विलीन हो गया है लेकिन अपने कार्यों के लिए वे सदा अमर रहेंगी। सबने एक स्वर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।

रिमझिम झा ने बहुत ही कुशलतापूर्वक गोष्ठी का संचालन किया और सभी का हार्दिक आभार व्यक्त किया।

रिपोर्ट 

सरिता सुराणा 

संस्थापिका 

सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था 

हैदराबाद, भारत

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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