कहानी :
कालचक्र
– लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)
सूरज अभी ढलने को था। कोलाहल भरे शहर को पीछे छोड़ धूल भरे रास्ते पर बस अब दौडऩे लगी थी। शहर की भीड़ से खचाखच भरी बस शहर से बाहर आते ही खाली सी हो गई थी। परम को पढ़ाई के बीच दो दिनों की छुट्टियाँ मिली थी। साल का अंतिम दिन रविवार के साथ आया था। काफ़ी दिनों से वह अपने ननिहाल जाने का सोच रहा था। आज सुबह उसने मां से जब यह कहा तो वह खुश हो गई। वह मां को भी दो दिन के लिए साथ ले जाना चाहता था। लेकिन वह तो एक हफ़्ते के लिए जाने पर कायम थी। जो संभव ही नहीं था। परम एमबीए के बाद कृषि क्षेत्र से जुड़ा व्यवसाय करने की सोच रहा था। जिस लिए उसे कुछ जानकारी हासिल करनी थी।उसका तो ननिहाल ही एक सहारा था। जहाँ सब जानकारी उसको मिल सकती थी।
बस के सफ़र का अगला पड़ाव आते ही वह उतर गया। शहर से पचास किलोमीटर की दूरी पर उसका ननिहाल था। जो अभी तक कच्चे रास्तों, उच्च शिक्षा की दूरी जैसे अभावों से जूझ रहा था। नानाजी की पुश्तैनी खेती थी। मामाजी दूध डेअरी की एक फर्म से जुड़े थे।
उसने चलते हुए देखा कि थोड़ी दूरी पर एक खेत में पंडाल लगा है। कार पार्किंग के लिए जगह बनाई गई है। इंग्लिश में कुछ लिखा एक बोर्ड था, जो दूर से साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। उसने सोचा, होगा कुछ, फिर वह चलने लगा।
नानाजी को उसने पहले ही फोन कर वह आनेवाला है, कह दिया था। इसलिए नानाजी तो उसके ही इंतजार में बैठे थे। परम घर के बाहर घूमते मामाजी और खेलते बच्चों को देखकर चिल्ला कर बोला, “मैं आ गया”। बच्चों ने तुरंत खेलना बंद कर दिया और उसको जाकर लिपट गए। मामाजी ने आवाज लगाई, “बाबूजी, परम..परमेश्वर आ गया है”
आजूबाजू जिनको भी यह सुनाई दिया, खुशी, कौतुहल से उनके चेहरे दमक उठें। सबने आकर उसको घेर लिया और परम उनके प्यार और अपनेपन से सिहर उठा।
घर में आकर उसने सबको अपने आने का कारण बताया। वह जिस जानकारी को जुटाना चाहता था, वह डेअरी प्राडक्ट से जुड़ी थी। मामाजी ने उसको कहा, “हम कल हमारे डेअरी फर्म जाएंगे। आप वहां सभी से बातचीत कर लेना”
“जी, मामाजी बिना किसी दलालों के शहर तक डेअरी प्राडक्ट कैसे पहुंचा सकेंगे। इस बात पर हम जानकारी प्राप्त कर रहे हैं”
मामाजी इस बात पर खुश हो गए, “शिक्षा को ऐसे सबके फ़ायदे के लिए जोड़ने से ही सबको मेहनत का फल मिलेंगा”
रात सबके साथ खाना खाते हुए काफ़ी दिनों की इकट्ठा बातें होती रही।
वह मामाजी के साथ आंगन में घूम रहा था। उसको दूर से गानों की आवाज़ें सुनाई देने लगी। उसने मामाजी से पूछा, “कोई शादी या अन्य कार्यक्रम हैं? जहां से यह गाने की आवाज आ रही है”
मामाजी हंसने लगे, “आज वर्ष ख़त्म हो रहा है। उसका और नववर्ष का ज़श्न है। यह वर्ष कैसा गुज़रा। किन किन मुश्किलों को हमने झेला। जंग के हालात में कैसे परेशान हो उठे थे। उन दुखों से इन गाने बजाने वाले- नाचने वालों का कोई लेना देना नहीं है। बस खेतों में पंडाल लगाकर वहां गुजरते साल का ज़श्न मनाने आ गए हैं”
परम को आते समय दूर एक पंडाल दिखाई दिया था। मामाजी की बातों को सुनकर वह कहने लगा, “यह एक घिनौना व्यापार है। खेतों को कुछ समय के लिए किराए से लेना। इस मौज मस्ती का केन्द्र उन्नति नहीं मानवता का सर्वनाश ही है। लेकिन अब यह किसी के बस में नहीं है।कानून भी अपना काम करता है लेकिन जनता को भी इससे दूर रहना चाहिए”
मामाजी निराशा से बोले, “अब गांवों के खेत भी इस मौज मस्ती के व्यापार में धकेले जा रहे हैं”
परम मामाजी की बात पर दुखी होकर कहने लगा, “हमारी परंपरा सबकी अच्छाइयों को अपनाने की है। खान-पान,पोशाकों, भाषाओं और ज्ञान के बारें में हमनें सभी की अच्छाइयों को अपने साथ में जोड़ा है। लेकिन नववर्ष के ज़श्न का ऐसा व्यापारीकरण जो युवाओं को गुमराह कर रहा है, उसको रोकने की जरूरत है”
“परम, एक सच्चाई यह भी है कि, चंद समय की मौज मस्ती कभी कभी बड़े हादसों का रूप ले लेती है। सबको इस बात को समझना चाहिए” मामाजी का स्वर व्यथित हो गया था।
“ जी, मामाजी साल का अंत युवाओं को भटकाने वाले आयोजनों से होना नहीं चाहिए। हम लोग तो अंताक्षरी खेलते हुए गुजरते साल को अलविदा और नये साल का स्वागत करते थे”
मामाजी गंभीरता को तोड़कर बोले, “हमारे समय तो ऐसा कुछ भी नहीं था। अब ऐसी बिगड़ी घटनाओं पर सब मिलकर सोचेंगे और अंमल करेंगे तो बदलाव आ ही जाएंगा। अब तो चलो हम गुजरते साल को अलविदा करने छत पर जाएंगे। वहां बच्चों ने छोटीसी पार्टी रखी है”
“अरे वाह! चलते हैं। मासूम बचपन के साथ गुजरते साल को अलविदा और नववर्ष का स्वागत”
दोनों छत की ओर जाने लगें।
नववर्ष का स्वागत करती, छत से बच्चों के तालियों की आवाज़ आ रही थी। समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। सुखद ठंडी लहरों के साथ नववर्ष 2026 आ गया था।
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संपादक,
ReplyDeleteश्री. देवेंद्र भाई सोनी जी,
मेरी कहानी, 'कालचक्र' प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत आभार!🙏
नववर्ष मंगलमय हो!🍁
नववर्ष के अवसर पर बेहतरीन कहानी
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