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दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर ... - विवेक रंजन श्रीवास्तव


 

दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर ...


 - विवेक रंजन श्रीवास्तव


श्री कैलाशचंद्र पंत हिंदी पत्रकारिता, भाषा सेवा और सांस्कृतिक चेतना के ऐसे वरिष्ठ पुरोधा हैं, जिन्होंने भोपाल को न सिर्फ राजनीतिक राजधानी, बल्कि साहित्यिक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पहचान दिलाने में निरंतर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। महू (जिला इंदौर) में 26 अप्रैल 1936 को जन्मे पंत जी ने एमए, साहित्याचार्य तथा साहित्य रत्न जैसे उच्च साहित्यिक उपाधियों के माध्यम से अपने अध्ययन को सुदृढ़ आधार दिया और आगे चलकर उसी विवेकपूर्ण दृष्टि को उन्होंने लेखन, संपादन तथा संस्थागत विकास से जोड़ा।वे मूलतः ऐसे रचनाशील पत्रकार और साहित्यसेवी हैं, जिन्होंने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज, शिक्षा, संस्कृति और जनजागरण की धारदार शक्ति में रूपांतरित किया है।


भोपाल में रहते हुए कैलाशचंद्र पंत ने यहाँ की साहित्यिक गतिविधियों, गोष्ठियों और वैचारिक विमर्श को नई दिशा दी।वे भोपाल से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका “अक्षरा” के संपादक के रूप में लंबे समय तक सक्रिय रहे, जहाँ उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों को मंच दिया और समकालीन मुद्दों पर सार्थक बहसों को प्रोत्साहित किया।

उनकी संवाद शैली सरल, स्पष्ट और लोकाभिमुख रही, जिसके कारण वे आम पाठक, रचनाकार और श्रोता सभी के बीच प्रिय बने।

कैलाशचंद्र पंत का एक बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भाषा सेवा को संस्थागत स्वरूप दिया। वे मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में मंत्री संचालक की भूमिका निभाते हुए हिंदी के प्रचार प्रसार के अनेक कार्यक्रमों से जुड़े रहे और नए लेखकों, विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए सतत प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।भोपाल स्थित हिंदी भवन न्यास और कृषि भवन जैसे सांस्कृतिक–बौद्धिक केंद्रों के विकास में उनकी भागीदारी उल्लेखनीय रही, जिससे साहित्यिक कार्यक्रमों, विमर्शों और सांस्कृतिक आयोजनों को स्थायी मंच प्राप्त हुआ। महू में स्थापित स्वध्याय विद्यापीठ के माध्यम से उन्होंने शिक्षा, भारतीय संस्कृति और जीवन–मूल्यों के प्रसार की जो पहल की, उससे असंख्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने लाभ उठाया और एक वैचारिक अनुशासन की परंपरा विकसित हुई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कैलाशचंद्र पंत ने हिंदी और भारतीय संस्कृति की गरिमा को सुदृढ़ किया। भारत सरकार और मध्यप्रदेश शासन के प्रतिनिधि के रूप में वे विभिन्न देशों की साहित्यिक यात्राओं पर गए और विश्व हिंदी सम्मेलनों सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषा की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। इससे उन्हें वैश्विक साहित्यिक पहचान तो मिली ही, साथ ही प्रवासी भारतीय समुदाय में हिंदी के प्रति आत्मविश्वास भी जागृत हुआ।उनकी इस बहुआयामी साधना को देखते हुए उन्हें पूर्व में अनेकों  सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है, जबकि हाल में भारत सरकार द्वारा वर्ष 2026 के लिए पद्मश्री अलंकरण हेतु उनके चयन ने मध्यप्रदेश और हिंदी जगत – दोनों का मान बढ़ाया है।

आज कैलाशचंद्र पंत केवल एक वरिष्ठ पत्रकार या हिंदी सेवी नहीं, बल्कि एक लोकसंग्रही, अध्ययनशील और विनम्र व्यक्तित्व के रूप में हमारे सामने हैं, जिनके जीवन–कर्म पर “संघर्ष से विजयपथ की ओर” जैसी पुस्तकों के माध्यम से विस्तार से प्रकाश डाला गया है।उनकी साधना यह संदेश देती है कि यदि भाषा को समाज, शिक्षा और संस्कृति से जोड़ा जाए तो वह मात्र विषय न रहकर जनचेतना की धारा बन जाती है। भोपाल के साहित्यिक परिदृश्य में पंत जी की उपस्थिति एक ऐसा स्थायी स्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता, ईमानदारी और सामाजिक सरोकार का पाठ पढ़ाती रहेगी।

उन्हें पद्मश्री सम्मान भोपाल के हिंदी जगत का सम्मान है। उनसे जुड़े हम साहित्य प्रेमियों के लिए गर्व का पल है।




 - विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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