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दुष्यंत संग्रहालय में प्रश्नोत्तरी के द्वारा कमलेश्वर की पुण्यतिथि मनाई


 

दुष्यंत संग्रहालय में प्रश्नोत्तरी के द्वारा कमलेश्वर की पुण्यतिथि मनाई 

- भोपाल को पहले दुष्यन्त के लिये जाना जाता था, अब दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के नाम से जाना जाता है: पंकज सुबीर 

- कमलेश्वर ने राजुरकर के अंदर अपना पुराना दौर देखा : आलोक त्यागी 

- फिर वो आवाज़ भी सुनाई नहीं दी : ममता कमलेश्वर 

भोपाल । दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के राज सदन में कमलेश्वर जी की पुण्यतिथि के अवसर पर उनके व्यक्तित्व -कृतित्व पर केन्द्रित प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कहानीकार पंकज सुबीर ने की । मुख्य अतिथि दुष्यन्त जी के बेटे आलोक त्यागी और विशिष्ट अतिथि कमलेश्वर जी की बेटी ममता कमलेश्वर थी ।इस अवसर पर कमलेश्वर जी की चर्चित कृति काली आंधी जिस पर आंधी फिल्म का निर्माण हुआ,यादों के चिराग, जलती हुई नदी अधूरी आवाज और रेत पर लिखे नाम समूह बनाए गए ।इस समूह में काली आंधी में सत्यदेव सोनी सत्य, श्रीमती शशि बंसल ,कमलेश नूर, प्रेक्षा सक्सेना ,प्रतिभा श्रीवास्तव और राजेश विश्वकर्मा शामिल थे ।समूह दो  यादों के चिराग में मनोज गुप्ता ,लक्ष्मीकांत जवणे, प्रदीप श्रीवास्तव, सुरेश शर्मा ,अरुण गुप्ता, मधु भूषण सिंघल शामिल थे ।समूह तीन जलती हुई नदी में रूपाली सक्सेना, वर्षा चौबे ,बिहारी लाल सोनी प्रतिभा द्विवेदी ,अपर्णा पात्रीकर और अभिलाषा श्रीवास्तव शामिल रही, चौथे समूह अधूरी आवाज में वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव, अनिल खरे के के श्रीवास्तव, श्रीमती कविता शिरोले, वीणा विद्या गुप्ता और रेनू श्रीवास्तव शामिल थी। समूह पांच रेत पर लिखे नाम में श्रीमती मृदुल त्यागी ,अनीता खरे, सीमा स्वरांगिनी खरे और मंजू गुप्ता शामिल थी ।इन समूह में प्रथम -यादों के चिराग ,द्वितीय- काली आंधी और तृतीय- अधूरी आवाज रही. इन समूहों को क्रमशः 1001,701, और 501 रुपए की सम्मान निधि प्रदान की गई।


 कार्यक्रम में अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए पंकज सुधीर ने कहा कि पहले भोपाल दुष्यंत के नाम से जाना जाता था और अब दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के नाम से जाना जाता है। उन्होंने  कहा का भोपाल में अनेक आयोजनों में लाखों-करोड़ों खर्च होते हैं उनमें वो रस नहीं आता जो संग्रहालय के आयोजनों में आता है।उन्होंने कमलेश्वर जी को याद करते  हुए बताया कि उनसे मैं बहुत कुछ सीखा। उन्होंने कहा कि कमलेश्वर जी मानते थे कि जो अपने समकालीन लेखकों से ईर्ष्या नहीं करता वह लेखन में आगे नहीं बढ़ सकता क्योंकि एक लेखक क्या लिख रहा है उससे हमें सबक लेते हुए या  सीखते हुए  अपने लेखन को सशक्त करना चाहिए ।उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि एक रूपसिंह चंदेल नाम के कहानीकार थे जो समीक्षा लिखने लगे थे तब कमलेश्वर जी ने उन्हें समझाया कि आप समीक्षा का काम मत करिए आप  बेहतर कहानीकार है और कहानी लिखिए ।उनकी इस बात से प्रेरणा लेकर ही मैंने भी समीक्षा लिखना छोड़ दिया और  कहानी और उपन्यासों के लेखन की तरफ ध्यान दिया ।उन्होंने आलोक और ममता के संबंध पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस तरह पहले दो राजा- महाराजाओं के परिवार में वैवाहिक संबंध होते थे परंतु एक अद्वितीय संबंध यह दो साहित्यकारों के परिवार के बीच में बना।  आलोक और ममता दो बड़े नामी साहित्यकारों की विरासत को संभाले हुए आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कमलेश्वर जी को याद करते हुए कहा कि दशानन यानी रावण को हम इसलिए दशानन कहते थे कि  उसके पास 10 कलाओं का ज्ञान था। इसी तरह कमलेश्वर जी जो भी किया सर्वश्रेष्ठ किया। उन्होंने  साहित्य को ग्लेमरस बनाया। उन्होंने कमलेश्वर जी की  कहानी चप्पल की मार्मिकता और कितने पाकिस्तान की वैश्विकता का जिक्र भी किया। 


 इस अवसर पर दुष्यंत के बेटे और कमलेश्वर के दामाद आलोक त्यागी ने उन्हें याद करते हुए कहा कि कमलेश्वर जी दुष्यंत संस्थान से पहले दिन से जुड़े रहे उनके इस संस्थान  के प्रति लगाव की वजह दुष्यंत  जी तो थे ही पर वे   राजूरकर के अंदर अपना पुराना दौर भी  देखते थे। कमलेश्वर जी की मानू से पहले एक बेटी थी जिसे वे भी देख भी नहीं पाए और वह गुजर गई, इसी पीड़ा के कारण उनहें  मानू  से अत्यधिक लगाव था।कमलेश्वर जी ने इतिहास में दर्ज होने के लिए अपना सृजन नहीं किया उन्होंने जो भी कुछ किया अपने अनुभव और दायित्व बोध के साथ किया। कमलेश्वर जी एक ऐसे लेखक हैं जिन्हें जो बड़ी जिन्हें लोग शिद्दत से याद करते हैं और उन्हें पढ़ते हैं ।जब मेरी पहली नौकरी एयर इंडिया की लगी तो मैं मुंबई गया उस समय मैं उनके घर से जब निकलने लगा तो कमलेश्वर जी ने पूछा कहां जा रहे हो मैंने कहा एयर  इंडिया के ऑफिस, तो उन्होंने कहा अरे मैं भी चलता हूं मुझे युसूफ यानी दिलीप कुमार से मिलना है ।एयरपोर्ट पर छोड़कर जब मैंने उन्हें देखा तो वह यूसुफ के घर की तरफ नहीं बल्कि अपने घर की तरह जा रहे थे। इस तरह से उन्हें दूसरों की मदद करने का जज्बा था ।जागरण के संपादक के रूप में जब उन्होंने रिजाइन किया तो उनके साथ तीस सहयोगियों ने भी रिजाइन कर दिया तब कमलेश्वर जी ने सहारा  सिर्फ इसलिए ज्वाइन किया ताकि उन तीस लोगों की  नौकरी का बंदोबस्त हो सके ।इस तरह कमलेश्वर जी सदैव दूसरों की मदद में भी लगे रहे ।


 इस अवसर पर सबसे मार्मिक प्रसंग था ममता कमलेश्वर या यू कहे ममता त्यागी का उद्बोधन उन्होंने इस अवसर पर पहले तो कमलेश्वर  जी को याद करते हुए खूब हंसायाऔर फिर रुलाया भी। अपने पापा की याद करते हुए इतनी भावुक हो गई की सभागार में बैठे सभी श्रोताओं की आंखें भी नम हो गई।


 उन्होंने कहा कि पापा जब थे तो हर सुबह रोज सुबह 8:00 बजे मुझे फोन करते थे और अपनी गतिविधियों के बारे में बताते थे। वे शहर से बाहर हो या विदेश में मुझे उस होटल का नाम और टेलीफोन नंबर दिया करते थे । आज उनको गए 19 साल हो गए और इन 19 सालों में अब मुझे उनकी आवाज सुनाई नहीं दी यह कहते हुए वे अत्यंत भावुक हो  गई। उन्होंने अपने दोनों बच्चों की चर्चा हुआ करते हुए कहा कि जब भी मैं उन्हें काम करते देखती हूं, मुझे उनमें अपने पापा की झलक दिखाई देती है। उन्होंने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि दुष्यन्त अंकल हमारे घर जब भी आते थे बड़ा धूम धड़ाका सा होता था, वे पापा से बहुत  चाहते थे । मुझे अपनी गोद में खिलाते हुए कई बार मेरी फरमाइशे  भी पूरी करते थे। एक बार जब पापा अपनी गृहस्थी का सामान जोड़ रहे थे तो वह मजाक में कहने लगे यह सामान तो मेरे घर ही जाने वाला है ।उस समय तो शायद यह सोचा भी नहीं था कि आलोक का और मेरा विवाह होगा पर उनकी मजाक में कहीं बात सच साबित हुई।

  इस कार्यक्रम का संयोजन और संचालन संग्रहालय के संयुक्त सचिव सुरेश पटवा ने किया। प्रश्नोत्तरी पर्यवेक्षक के रूप में श्री गोकुल सोनी, विमल कुमार शर्मा और श्रीमती सुधा दुबे मंचासीन रहे। स्वागत उद्बोधन संग्रहालय की निदेशक करुणा राजुरकर ने  दिया और आभार संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने व्यक्त किया।


रिपोर्ट – करुणा राजुरकर 

सचिव 

दुष्यंत स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय 

भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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