लघुकथा :
तुम जैसा कोई नहीं
हर साल की तरह इस बार भी नीरा का जन्मदिन आया, पर इस बार सब कुछ वैसा नहीं था।
रसोई से कोई महक नहीं आ रही थी,
कोई नहीं कह रहा था ,
"सुंदर साड़ी पहन लो, पंखे के नीचे बैठो, आज तुम्हारा दिन है।"
राकेश नहीं था।पर उसकी यादें थीं,
बिलकुल साफ़, जैसे कल की बात हो।
नीरा की आँखें सामने टंगी तस्वीर पर जा टिकीं । जिसमें उसकी वही हँसी थी जो हर साल उसके जन्मदिन को एक त्योहार बना देती थी।
उसे याद आया,कैसे दो दिन पहले से ही राकेश उसकी पसंदीदा चीजें बनाने लगता, कैसे उसे किचन के पास भी फटकने नहीं देता।
कहता ,
"आज का दिन बस तुम्हारा है नीरा,
अपने मन की करो।
दोस्तों से बात करो, माँ से मिलो,
मुस्कुराओ... बस मुस्कुराओ।"
वो बातें अब सिर्फ़ याद बन गई थीं,
लेकिन इतनी गहरी कि हर साल,
राकेश के बिना भी नीरा खुद को उसी पंखे के नीचे बैठा पाती थी,
जैसे राकेश कह रहा हो ,
"आज भी तुम्हारा दिन है नीरा,
और मैं यहीं हूँ — तुम्हारी यादों में,
तुम्हारी हर मुस्कान के पीछे।"
नीरा की आँखें भीग आईं।
उसने तस्वीर की ओर देखा और धीरे से कहा ,
"सच में, राकेश... तुम जैसा कोई नहीं।"
- डॉ अंजना गर्ग , दिल्ली
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