नल से ज़हर, मंच से पुरस्कार : यही है विकास का सच?
[नलों से बहती मौत और फाइलों में बहती सफ़ाई]
[तमगों के नीचे दबती ज़िंदगियाँ: इंदौर की चुप चीख]
मध्यप्रदेश का इंदौर शहर, जिसे वर्षों से देश की स्वच्छता राजधानी कहा जाता रहा है, आज एक ऐसी पीड़ा का प्रतीक बन गया है जिसने इस तमगे की सच्चाई पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जिस शहर को “स्वच्छ भारत अभियान” का आदर्श मॉडल बताया जाता है, वहीं भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से लोगों की जान जाना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की गहरी विफलता का प्रमाण है। पानी, जिसे जीवन का आधार माना जाता है, जब वही मृत्यु का कारण बन जाए तो यह पूरे तंत्र के लिए आत्ममंथन का क्षण होना चाहिए। चमकती सड़कों, पुरस्कारों और प्रशस्ति पत्रों के पीछे छिपी यह सच्चाई आज सामने आ चुकी है कि स्वच्छता का अर्थ केवल दिखावा बनकर रह गया है। एक ओर शहर की छवि चमकाई जाती रही, दूसरी ओर नलों से ऐसा पानी बहता रहा जो नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हुआ। यह त्रासदी केवल कुछ घरों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक मॉडल पर प्रश्नचिह्न है।
इस घटना की जड़ें अचानक नहीं उभरीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा और लापरवाही में छिपी हैं। जानकारी के अनुसार जल आपूर्ति व्यवस्था में सीवेज का पानी मिल गया, जिससे संक्रमण फैला और बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े। यह केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सतत निगरानी के अभाव का नतीजा है। नगर व्यवस्था जिन पाइपलाइनों के सहारे लाखों लोगों को पानी पहुंचाती है, उनकी नियमित जांच और मरम्मत अनिवार्य होनी चाहिए थी, लेकिन इसे लगातार टाला गया। परिणाम यह हुआ कि एक सामान्य परिवार का सदस्य, जिसने रोज़ की तरह नल से पानी पिया, अस्पताल के बिस्तर तक पहुंच गया। किसी घर में बुज़ुर्ग की हालत बिगड़ी, कहीं महिलाएं और बच्चे उल्टी-दस्त से जूझते दिखे। अस्पतालों में अफरा-तफरी मच गई। यह दृश्य उस शहर के लिए शर्मनाक है जो खुद को जल प्रबंधन में अग्रणी बताता है। सवाल उठता है कि जब प्रमाणपत्र और दावे मौजूद थे, तो ज़मीनी हकीकत इतनी भयावह कैसे हो गई?
यह त्रासदी प्रशासनिक जवाबदेही की कमजोर कड़ी को भी उजागर करती है। घटना के बाद कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जब किसी व्यवस्था की लापरवाही से नागरिकों की जान जाती है, तो जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह सकती। पूरी श्रृंखला की जवाबदेही तय होनी चाहिए। नगर प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व, जिनके अधीन जल आपूर्ति तंत्र संचालित होता है, उनकी भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। यह पहली बार नहीं है जब दूषित पानी की शिकायतें सामने आई हों। पहले भी अलग-अलग इलाकों से ऐसी चेतावनियाँ आती रही हैं, लेकिन उन्हें या तो नजरअंदाज किया गया या अस्थायी मरम्मत कर मामला दबा दिया गया। यही लापरवाही धीरे-धीरे एक बड़े संकट का रूप लेती चली गई। स्वच्छता पुरस्कारों की चमक ने असली समस्याओं पर परदा डाल दिया और बुनियादी सेवाएं हाशिये पर चली गईं।
इस पूरे मामले में एक गहरी सामाजिक असमानता भी स्पष्ट दिखाई देती है। अक्सर देखा गया है कि संपन्न इलाकों में फिल्टरयुक्त पानी, निजी टैंकर और वैकल्पिक व्यवस्थाएं उपलब्ध रहती हैं, जबकि गरीब और मध्यम वर्ग पूरी तरह सरकारी आपूर्ति पर निर्भर होता है। जब वही आपूर्ति जहरीली बन जाती है, तो सबसे अधिक नुकसान इन्हीं वर्गों को उठाना पड़ता है। यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय भी है। स्वच्छता और सुरक्षित पानी यदि अधिकार हैं, तो वे सभी के लिए समान रूप से होने चाहिए। किसी शहर का मूल्यांकन उसकी सड़कों या रैंकिंग से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसका सबसे कमजोर नागरिक कितना सुरक्षित है। यदि गरीब बस्तियों में रहने वाले लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, तो किसी भी तरह का “वाटर प्लस” का तमगा खोखला साबित होता है।
इस घटना ने लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका पर भी गंभीर चर्चा छेड़ दी है। सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है, अपराध नहीं। जब लोग अपने स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाते हैं, तो उन्हें विरोधी या साजिशकर्ता बताकर खारिज करना खतरनाक प्रवृत्ति है। शिकायत करना व्यवस्था को बेहतर बनाने की पहली सीढ़ी होती है। जिन इलाकों में यह हादसा हुआ, वहां पहले भी लोगों ने पानी की गुणवत्ता को लेकर चेतावनी दी थी, लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब जब हालात बिगड़ चुके हैं, तब जांच समितियों और आश्वासनों की बाढ़ आ गई है। इतिहास गवाह है कि ऐसी समितियां अक्सर समय के साथ निष्क्रिय हो जाती हैं और दोषियों तक बात नहीं पहुंचती। पीड़ित परिवार मुआवजे के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं, जबकि मूल समस्या जस की तस बनी रहती है। यह स्थिति प्रशासन और जनता के बीच विश्वास को गहरा आघात पहुंचाती है।
सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उठ रही आवाजें इस असंतोष का प्रतीक हैं। लोग सवाल कर रहे हैं, जवाब मांग रहे हैं और पारदर्शिता की अपेक्षा कर रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है, बशर्ते इसे दबाने के बजाय सुना जाए। प्रशासन को आलोचना को चुनौती नहीं, बल्कि सुधार के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जब सवालों से डर पैदा होता है, तब यह संकेत मिलता है कि व्यवस्था के भीतर कुछ छिपाने की कोशिश हो रही है। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां सत्ता जवाब देने के लिए तैयार हो और गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने की इच्छाशक्ति रखे।
अब समय आ गया है कि इस त्रासदी से ठोस सबक लिया जाए। केवल बयान, जांच और निलंबन पर्याप्त नहीं हैं। जल आपूर्ति प्रणाली का व्यापक और तकनीकी सुधार आवश्यक है। पाइपलाइनों की नियमित जांच, आधुनिक सेंसर आधारित निगरानी, समय-समय पर जल परीक्षण और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करना अनिवार्य होना चाहिए। नागरिकों को भी निगरानी प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए, ताकि शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो सके। “वाटर प्लस” जैसे तमगे तभी सार्थक होंगे जब हर घर के नल से सुरक्षित और स्वच्छ पानी निकले। इसके साथ ही दोषियों पर कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोहराई न जाए।
यह घटना एक चेतावनी है कि अगर अब भी व्यवस्था नहीं सुधरी, तो ऐसी त्रासदियाँ दोहराई जाती रहेंगी। पानी पीकर मर जाना दुर्भाग्य नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध है, जिसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। नागरिकों का यह मौलिक अधिकार है कि वे बिना भय के पानी पी सकें और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकें। इस अधिकार की रक्षा तभी संभव है जब सवाल पूछने की संस्कृति मजबूत हो, जवाबदेही सुनिश्चित हो और दिखावे की जगह वास्तविक सुधार को प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि अंततः सवाल ही बदलाव की शुरुआत होते हैं, और चुप्पी केवल अन्याय को लंबा जीवन देती है।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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