काव्य :
दोष किसका ?
उमर से पहले बड़ी हुई वह ,
लक्ष्मी नाम की छोटी सी गुड़िया ।
घर घर का काम कर पढ़ाई करती ,
जब उमर थी खेलने की गुड्डे गुड़िया ।
कैसी निष्ठुर ही थी वह मां जो ,
दूध पीती बेटी को छोड़ गई ।
ममता का गला घोंटकर वह ,
पराए पुरुष से नाता जोड़ गई ।
क्या ही दोष उस मासूम का ,
जो उस पर सभी पाबंदियां है ।
अपनी मेहनत से पुस्तकें लेती ,
फिर उस पर उठती क्यों उंगलियां है ।
कभी मायूस होती कभी उदास ,
जीने की क्या बचेगी उसमें आस ।
जब अपने ही इस बेचारी को सताएंगे,
कुलक्षणी की बेटी कुलक्षणी कह कर पुकारेंगे ।
लक्ष्मी के चेहरे पर मुस्कान,
बहुत कम ही अब खिलता है।
अपना आसमान ढूंढने जब निकले,
तीखे कटाक्षों का तीर कमान मिलता है।
-श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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