मतदाता सूची का मेगा रीसेट: जनता, वोट और सत्ता की जंग
मृतक, डुप्लीकेट और गायब नाम: लोकतंत्र की परीक्षा यूपी में
[मतदाता सूची की सफाई: अधिकार सुरक्षित या लोकतंत्र कमजोर?]
उत्तर प्रदेश में हाल ही में मतदाता सूची में बड़ा संशोधन आया, जिसने राजनीति और प्रशासन दोनों में हलचल मचा दी है। 2.89 करोड़ नाम हटने के बाद लोकतंत्र की नींव पर गंभीर प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। क्या यह कदम चुनावों को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने की वास्तविक कोशिश है, या सत्ता की चालाकी और रणनीति का हिस्सा मात्र? देश के सबसे बड़े राज्य में इस बदलाव ने व्यापक बहस को जन्म दिया है। शुद्धता के दावे और अन्याय के आरोपों के बीच जनता उलझन में है। ड्राफ्ट सूची में यह विशाल संशोधन दिखाता है कि मतदाता सूची केवल कागजी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ और उसकी विश्वसनीयता का प्रमाण है।
चुनाव आयोग ने 6 जनवरी 2026 को ड्राफ्ट सूची जारी की, जिसमें कुल 15.44 करोड़ मतदाताओं में से 2.89 करोड़ नाम हटा दिए गए। अब कुल वैध नाम केवल 12.55 करोड़ बचे हैं। हटाए गए नामों में 46.23 लाख मृतक, 2.17 करोड़ स्थानांतरित और 25.47 लाख डुप्लिकेट नाम शामिल हैं। यह कुल मतदाताओं का 18.7 प्रतिशत है, जो भारत में किसी भी राज्य में सबसे बड़ा संशोधन माना जा रहा है। एसआईआर की समयसीमा और ड्राफ्ट प्रकाशन कई बार बढ़ाया गया, क्योंकि सूची में बड़े पैमाने पर असंगतियां मिलीं। दावा-आपत्ति की अवधि 6 फरवरी तक है, जिससे सभी प्रभावित लोग फॉर्म भरकर नाम जोड़ सकते हैं। इस विशाल हटाव ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या यह लोकतंत्र को मजबूत करने का कदम है, या लक्षित राजनीतिक कार्रवाई है।
लोकतंत्र की शुद्धता के समर्थक इसे ऐतिहासिक सुधार कहते हैं। उनके अनुसार, मृतक और डुप्लिकेट नाम चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। इससे वोटिंग सिस्टम में फर्जीवाड़ा रोका जा सकता है। एसआईआर प्रक्रिया के अनुसार, 81.3 प्रतिशत मतदाताओं ने गणना फॉर्म जमा किए, जबकि बाकी नहीं कर सके। इस तरह की सफाई अन्य राज्यों में भी हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश में कटौती सर्वाधिक रही। समर्थकों का कहना है कि इससे वोट बैंक की राजनीति कमजोर होगी और असली मतदाताओं की आवाज़ को ताकत मिलेगी।
विपक्षी दल इसे राजनीतिक साजिश मान रहे हैं। उनका तर्क है कि गरीब और अल्पसंख्यक समुदाय के वोटों को प्रभावित किया जा रहा है। कई नेता और उनके परिवार के नाम हटाए जाने का दावा कर रहे हैं। उनका कहना है कि केवल निवास बदलने के कारण वैध मतदाताओं को बाहर किया गया। विरोधियों का आरोप है कि यह लोकतंत्र पर हमला है और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। शहरी क्षेत्रों और प्रवासी आबादी में अधिक नाम हटाए गए हैं, जिससे यह आशंका बढ़ रही है कि यह उद्देश्यपूर्ण कार्रवाई हो सकती है।
तथ्यों की पड़ताल करें तो आयोग ने हटाव के स्पष्ट कारण बताए हैं—मृत्यु, स्थानांतरण और डुप्लिकेट नाम। लखनऊ और गाजियाबाद जैसे शहरी केंद्रों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए। घर-घर जाकर फॉर्म भरवाए गए और 91 प्रतिशत से अधिक मैपिंगकी गई। शेष को नोटिस भेजे जा रहे हैं। बावजूद इसके, इतनी बड़ी संख्या ने संदेह पैदा कर दिया है। क्या सभी फॉर्म न जमा करने वाले असली मतदाता नहीं हैं? आयोग का कहना है कि दावा-आपत्ति प्रक्रिया में सुधार संभव है और यह निष्पक्षता दिखाती है। विपक्ष का कहना है कि दस्तावेज जुटाने में गरीब और अनपढ़ मतदाताओं को दिक्कत होगी, जिससे लोकतंत्र की वैधता पर सवाल उठते हैं।
इस संशोधन का आगामी चुनावों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें निर्णायक मानी जाती हैं। अगर वैध मतदाता भी हट गए, तो वोट प्रतिशत और चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। समर्थक इसे फर्जीवाड़ा रोकने का कदम मानते हैं, जबकि विपक्ष इसे वोट दबाने की रणनीति कह रहा है। एसआईआर की अवधि बढ़ने से सत्यापन बेहतर हुआ, लेकिन गरीब और अल्पसंख्यक समुदाय इससे सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। यह सवाल उठता है कि क्या प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी है या नहीं।
समाज पर नजर डालें तो प्रवासी मजदूर, शहरी गरीब और छोटे शहरों के मतदाता सबसे प्रभावित हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं रहे। विपक्ष इसे मतदाता दमन मान रहा है। वहीं आयोग का कहना है कि मृतक नाम हटाना अनिवार्य था और यह रूटीन प्रक्रिया है। अन्य राज्यों में भी ऐसा सुधार होना चाहिए। मतदाता सूची की शुद्धता ही चुनाव की नींव है। अगर फर्जी नाम मौजूद रहें, तो लोकतंत्र कमजोर होगा। वहीं वैध नाम हटने से अन्याय होगा। जनता को जागरूक होना आवश्यक है।
आगे की राह में आयोग के लिए पूर्ण पारदर्शिता अनिवार्य हो गई है। दावा-आपत्ति की अवधि में लाखों मतदाता अपने अधिकार को सुरक्षित कर सकते हैं, और यदि कोई वैध मतदाता सूची से बाहर रह गया, तो लोकतंत्र की नींव हिल सकती है। अन्य राज्यों के अनुभव और उदाहरण हमें यह सिखाते हैं कि मतदाता सूची सिर्फ एक प्रशासनिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि हर नागरिक की राजनीतिक पहचान का प्रतीक है। इसलिए इसकी नियमित समीक्षा और सुधार न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से होना चाहिए।
यह संशोधन दोधारी तलवार की तरह है—2.89 करोड़ नामों के हटने ने सार्वजनिक बहस और राजनीतिक विवाद को हवा दी है। यदि हटाए गए नाम केवल फर्जी थे, तो यह लोकतंत्र की शुद्धता की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा। लेकिन यदि वैध मतदाता प्रभावित हुए, तो यह अधिकार और विश्वास दोनों को क्षति पहुंचा सकता है। विपक्ष को ठोस प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे और आयोग को अपनी निष्पक्षता साबित करनी होगी। लोकतंत्र तब मजबूत रहेगा जब हर वैध वोट गिना जाएगा और किसी की आवाज़ दबाई नहीं जाएगी। यह प्रकरण याद दिलाता है कि वोट हमारा अधिकार है और सुरक्षित रहना चाहिए। समय ही बताएगा कि यह कदम लोकतंत्र की शुद्धता था या राजनीतिक खेल।
उत्तर प्रदेश का यह उदाहरण हमें एक बड़ा और सशक्त सबक देता है। बड़े बदलाव सोच-समझकर और पूरी सावधानी के साथ होने चाहिए, क्योंकि हर गलती सीधे लोकतंत्र की नींव को हिला सकती है। जनता के लिए यह जिम्मेदारी बन गई है कि वह अपने नाम, अपने अधिकार और मतदाता रिकॉर्ड की खुद जांच करे। हर मतदाता जागरूक रहे, ताकि किसी की आवाज दबाई न जा सके और हर वैध वोट सुरक्षित रहे। चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता पर ध्यान देना अब केवल प्रशासन का कर्तव्य नहीं, बल्कि हर नागरिक की अनिवार्य भूमिका बन चुकी है।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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