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काव्य : मांदर के बोलो पर झूमे नाचे गायें -पद्मा मिश्रा,जमशेदपुर


 काव्य : 

मांदर के बोलो पर झूमे नाचे गायें

1

फसलों की रानी ओढे चूनर धानी

मन की पतंग उडे नील-आसमानी

झूमे धरती -लहरे नदिया का पानी

आओ सखी सपनों की दुनिया बसायें

मांदर के बोलों पर झूमे नाचे गायें

आज मकर संक्रांति बेलासुहानी

नाच उठा तनमन -जगीं सुधियां पुरानी 

आओ सखी अनुरागी चूनर सजाये

मांदर के बोलों पर झूमे नाचे गायें..

मौसम की शीतलता तन को सिहराती 

गुनगुनी हवाएं भी नेह गीत गाती,चलो 

आज सूरज का परचम सजायें.

मांदर के बोलो पर झूमे नाचे गायें


2--

धरती के गीत


झूम उठी धरती की मोहक अंगडाई हैं

मांदर के ताल पर पुरवा लहराई हैं।

गुड की मिठास लिये रिश्तोंको सजने दें

सखी आज मौसम को जी भर संवरने दें

नदिया के तट किसने बांसुरी बजाई हैं

झूम उठी धरती की मोहक अंगडाई हैं।

हरियाली खेतों की,धानी चूनर मन की

भींगे से मौसम में साजन के आवन की

थिरक रहे नूपुर ज्योंगोरी शरमाई हैं 

झूम उठी धरती की मोहक अंगडाई हैं।

टुसू का परब आज नाचे मन का मयूर

मतवारे नैनों में प्रीत का नशा हैं पूर

सूरज की नई किरऩ लालिमा सी छाईहै

झूम उठी धरती की मोहक अंगडाई हैं।

बहक रही मादकता ,जाग रही चंचलता

घुंघरु के बोल बजे,बिहु के गीत सजे

घर आंगन वन उपवन जागी तरुणाई हैं

झूम उठी धरती की मोहक अंगडाई हैं।

 - पद्मा मिश्रा,जमशेदपुर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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