समीक्षा :
संदीप नेमा ‘दीप’ का काव्य-संग्रह “मनसुख : अंतर्मन से उपजी कविताओं का आत्मीय दस्तावेज है ”
“मनसुख” शीर्षक अपने भीतर एक गहन अर्थवत्ता समेटे हुए है। यह केवल बाहरी प्रसन्नता का द्योतक नहीं, बल्कि मन के भीतर उपजने वाले उस आत्मिक संतोष और आनंद का संकेत है, जो जीवन के विविध अनुभवों से निर्मित होता है। संदीप नेमा ‘दीप’ का काव्य-संग्रह “मनसुख” इसी अंतर्मन के सुख, संवेदना और जीवन-दृष्टि का सजीव प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है।
संग्रह की भावभूमि को समझने के लिए कविता “ज़िंदगी और मौत” की पंक्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—
“ज़िंदगी से कहा हमने हम प्यार करेंगे,
मौत भी आये तो हम स्वीकार करेंगे।
ज़िंदगी और मौत का हो रहा मंथन,
किसी का किसी पर नहीं कोई बंधन…”
इन पंक्तियों में जीवन के प्रति स्वीकृति, संतुलन और एक शांत दार्शनिक दृष्टि दिखाई देती है। यही स्वर पूरे संग्रह में अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित होता है और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
इस काव्य-संग्रह में कुल 101 कविताएँ हैं, जो जीवन के विविध आयामों को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करती हैं। कवि ने इन्हें विषयानुसार संयोजित कर एक स्पष्ट संरचना दी है। संदीप नेमा जी का मूल स्वर आस्थामूलक है, जिसके कारण अधिकांश कविताएँ पाठक को आध्यात्मिक ऊँचाइयों की ओर ले जाती हैं। इनमें श्रद्धा, विश्वास और आत्मिक जुड़ाव का सौम्य प्रकाश परिलक्षित होता है।
“अर्पण अभिषेक” कविता में यह आस्था अत्यंत सहज रूप में अभिव्यक्त हुई है—
“बिल्ब पत्र न मिले कोई गम नहीं,
शमी न हाथ आए कोई डर नहीं।
न हो दूध गंगा का जल अभिषेक,
ले कर भाव मन कर तू अभिषेक।”
यहाँ कवि बाह्य आडंबर से अधिक अंतःकरण की पवित्रता को महत्त्व देता है।
संग्रह की लगभग दस से अधिक कविताएँ पारिवारिक संबंधों की आत्मीय दुनिया को जीवंत करती हैं। पिता, माता, पत्नी और दादा जैसे रिश्तों के माध्यम से कवि ने घरेलू संवेदनाओं को मार्मिक ढंग से उकेरा है। “मेरी माँ” कविता इसका सशक्त उदाहरण है—
“उसे प्रचार की नहीं, प्यार की जरूरत है,
ब्रांडिंग की नहीं, अंतरंग की जरूरत है…”
और—
“बैठी हो अकेले में जब कभी,
दिल से मुलाकात की जरूरत है…”
इन पंक्तियों में आधुनिक जीवन के कृत्रिम प्रदर्शन के स्थान पर सच्चे और आत्मीय संबंधों की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। यह भाव सहज ही पाठक के निजी अनुभवों से जुड़ जाता है।
कवि ने अपने कार्यक्षेत्र से जुड़े विषय—विद्यालय, शिक्षक दिवस और हिंदी दिवस—को भी अपनी रचनाओं में स्थान दिया है। इन कविताओं में उसका शिक्षक-मन, कर्तव्यबोध और भाषा-प्रेम स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होता है, जिससे संग्रह में सामाजिक और व्यावहारिक आयाम भी जुड़ता है।
साथ ही, इस काव्य-संग्रह में इतिहास-बोध की एक हल्की किंतु अर्थपूर्ण उपस्थिति भी दिखाई देती है। ग्यारसपुर जैसे ऐतिहासिक स्थल के संदर्भ में कवि का दृष्टिकोण केवल वर्णनात्मक नहीं, बल्कि आत्मीय और स्मृतिपरक है। “ग्यारसपुर” कविता की पंक्तियाँ इस भाव को पुष्ट करती हैं—
“शिखरों में माला देवी,
देवियों में शीला देवी, सरला देवी…
सुंदरियों में विश्व सुंदरी,
ग्यारसपुर की शालभंजिका…”
यहाँ इतिहास और निजी संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
भाषा की दृष्टि से “मनसुख” सरल, सहज और संप्रेषणीय है। कवि ने जटिलता और अत्यधिक अलंकारिकता से बचते हुए भावों की स्पष्टता और आत्मीयता को प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि यह संग्रह सीधे पाठक के हृदय तक पहुँचने में सफल होता है।
समग्रतः “मनसुख” एक ऐसा काव्य-संग्रह है, जिसमें आस्था, घर-परिवार, समाज, तीज-त्योहार, प्रकृति, पर्यावरण, कर्मभूमि और सांस्कृतिक चेतना के विविध रंग संतुलित रूप में उपस्थित हैं। साथ ही, अतीत की सुनहरी यादों की धुंधली छवियाँ कविता के कैनवास पर अनेक स्थलों पर चित्रित हैं। यह कृति पाठक को जीवन के छोटे-छोटे सुखों की ओर उन्मुख करती है और उसे आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करती है।
हालाँकि, समीक्षा की दृष्टि से यह भी उल्लेखनीय है कि संग्रह की अधिकांश कविताएँ ‘स्वांतः सुखाय’ की प्रवृत्ति से प्रेरित प्रतीत होती हैं। इनमें कवि की निजी अनुभूतियाँ और आत्मिक संतोष तो प्रचुर मात्रा में है, किंतु अपने समय के व्यापक सामाजिक सरोकारों और समकालीन यथार्थ से इनका जुड़ाव अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
इसी संदर्भ में यह विनम्र सुझाव दिया जा सकता है कि कवि यदि अपनी संवेदनशीलता को काव्य-परंपरा और समकालीन कविता की प्रवृत्तियों से अधिक जोड़कर देखे, तो उसकी रचनाएँ और अधिक व्यापक, प्रभावशाली तथा समय-सापेक्ष बन सकती हैं।
कवि का आत्मकथ्य इस संग्रह की मूल भावना को स्पष्ट करता है—
“मेरे लिए मेरा काव्य वास्तव में किसी रत्न से कम नहीं। जब कभी मन में यकबयक उपजते चित्रों को कलम से उकेरा, मेरे लिए वह कविता का स्वरूप लिए अनुपम उपहार रहा। यों, कभी विशेष प्रयत्नों से विषय को बाँधकर परम्परागत रूप से कविता लिखना चाहा, तो सिर्फ विचित्र शब्दों का मेल ही मिला। इसीलिए काव्य मुझे मेरे शब्दों में ‘मनसुख’ ही प्रतीत होता है। इस संग्रह में मैंने अपने ‘मनसुख’ के ऐसे ही कुछ रत्न जड़ने का योजन किया है।”
यह आत्मस्वीकृति कवि की सहजता और सृजन-प्रक्रिया की प्रामाणिकता को दर्शाती है।
अंततः, संदीप नेमा ‘दीप’ जी से यही विनम्र निवेदन है कि कविता केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, बल्कि एक गंभीर सृजनात्मक कर्म है, जिसका सीधा संबंध सामाजिक सरोकारों से भी होता है। यदि वे अपने भीतर उपजे इन “मनसुख” के रत्नों को व्यापक मानवीय और सामाजिक संदर्भों से और अधिक जोड़ें, तो न केवल उनकी रचनाशीलता और अधिक परिपक्व होगी, बल्कि वे स्वयं के साथ-साथ साहित्य को भी समृद्ध कर सकेंगे।
इस प्रकार “मनसुख” एक सच्चे मन से उपजी काव्य-यात्रा है, जो अपनी आत्मीयता, सरलता और संवेदनशीलता के कारण पाठक को स्पर्श करती है तथा भविष्य में और अधिक सशक्त संभावनाओं की ओर संकेत करती है।
सभी कविताएँ अन्तर्लय के निकष पर खरी हैं। कवि ने न तो पारम्परिक कवियों की शैली को अपनाया है, न अपने समय के हस्ताक्षरों का अनुशरण किया है; जो लिखा, स्वयं का, स्वयं के लिए लिखा है।
- मनोज जैन मधुर
गीतकार
106, विट्ठल नगर
गुफामन्दिर रोड, लालघाटी, भोपाल
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