उत्तर की लय-दक्षिण का ताल 'लोक रंग नृत्य संवाद' ने मोहा कला प्रेमियों का मन
दिल्लीः । कहा जाता है कि जहां शब्द थक जाते हैं तब वहां कला बोलना शुरू करती है। और जब कला के दो छोर- उत्तर का 'कथक' और दक्षिण का 'भरतनाट्यम' एक साथ मिलते हैं तो निर्माण होता है एक ऐसी शाम का जिसे इतिहास याद रखता है।
विगत दिवस *दिल्ली का 'हिंदी भवन' ऐसी ही ऐतिहासिक शाम का गवाह बना जहां 'अंतस सेवा फाउंडेशन' द्वारा आयोजित 'लोक रंग नृत्य संवाद' ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दो महान धाराओं को एक मंच पर ला खड़ा किया। उत्तर का 'कथक' और दक्षिण का 'भरतनाट्यम' ये सिर्फ दो नृत्य शैलियां ही नहीं थीं बल्कि दो संस्कृतियों के बीच एक भावपूर्ण संवाद था।
इस कार्यक्रम को BSES राजधानी लिमिटेड, हडको और इरेडा के विशेष सहयोग से तैयार किया गया था। इसका एकमात्र उद्देश्य था- कला के जरिए पूरे भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोना। शाम की शुरुआत हुई कथक की प्रख्यात गुरु अनुराधा शर्मा और उनके समूह के साथ, उनके सधे हुए पैरों की थिरकन ने दर्शकों को अपनी कुर्सियों से बांधे रखा। वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारतीय संस्कृति की जीवंत छटा बिखेरने आईं गुरु राधिका कठल और उनका समूह। भरतनाट्यम की बारीकियों और उसकी ऊर्जावान प्रस्तुति ने ये साबित कर दिया कि भाषा भले अलग हो लेकिन भाव एक ही हैं। इन दोनों शैलियों के बीच का यह 'संवाद'कला प्रेमियों के लिए किसी आध्यात्मिक अनुभव से कम नहीं था। इस भव्य शाम की गरिमा बढ़ाने के लिए मुख्य अतिथि के रूप में कृपाशंकर जी (उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड प्रचार प्रमुख, RSS) मौजूद रहे। इसके साथ ही संगीत नाटक अकादमी लखनऊ की उपाध्यक्ष श्रीमती विभा सिंह और पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध कथक कलाकार नलिनी और कमलिनी, अस्थाना जी ने भी अपनी उपस्थिति से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। संस्था के वरिष्ठ पदाधिकारियों-बिनय सिन्हा, धनंजय सिंह, मिहिर मिश्रा, डॉ. प्रियंका सिंह और स्मिता श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर संस्था ने स्पष्ट किया कि 'अंतस सेवा फाउंडेशन' का यह प्रयास शास्त्रीय विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक छोटा सा लेकिन अहम कदम है।
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