काव्य :
शिव रात्रि
हे नीलकंठ,हैआशुतोष,हे त्रिपुरारी,
कष्ट हरो महादेव, हे भोलेनाथअविकारी,
हे शंभू नाथ ,महाकाल ,जटा में गंगा बिराजे ,
कंठ में सर्प माला, मुकुट पर चंदा साजे।
जय अर्धनागेश्वर ,करो सृष्टि का उद्धार,
जगत के यह सृष्टि कर्ता,पालनहार,
त्रिशूल में जिसकी शक्ति का भंडार,
जटा से बह रही जिसके गंगा धार।।
गौरा पति महाकाल,बद्रीनाथ की महिमा विशाल,
छुकर तेरी चरण धूलि बोल उठे नर कंकाल,
करे स्तुति जो कोई तेरी महाकाल,
हो जाए जीवन उसका निहाल।।
औघड़दानी, भूतेश्वर की महिमा अपरंपार,
ये नीलेश्वर ,ये अभ्यंकर ,ये है सुख सार ,
हे विघनेश्वर ,हे सर्वेश्वर ,करें तेरी सब जय जयकार ,
कंठ बसो तुम सबके, बन करके ओंकार ।।
- नीता गुप्ता
रायपुर छत्तीसगढ़
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