काव्य :
पछताना है
बहरों तक पहुंचाना है ।
अंधों को दिखलाना है।
बीच राह जो छूट गया ।
मंजिल तक पहुंचाना है ।
हर कपड़े की यही कथा ।
ताना है और बाना है।
जो मिल पाना नामुमकिन।
उस पर ही अड़ जाना है।
गलत किया क्यों कभी कहीं।
अब केवल पछताना है।
लाज तेरे रू की जीनत।
गैरों से शरमाना है।
- आर एस माथुर ,इंदौर
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