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यह युद्ध नहीं, मानवता का सार्वजनिक दाह-संस्कार है -प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)





 यह युद्ध नहीं, मानवता का सार्वजनिक दाह-संस्कार है

[विश्व राजनीति की शतरंज और इंसानियत की बलि]

[धर्मग्रंथ खुले हैं, लेकिन नीति और राजनीति में करुणा कहीं खो गई]


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


मध्य पूर्व की धरती आज बारूद नहीं, मानो जलती हुई मानवता की गंध से भर उठी है। अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच यह अब केवल सीमाओं का टकराव नहीं—खामेनेई के नाम के साथ सिमटती ईरानी सत्ता ने दुनिया की हर धड़कन पर अनिश्चितता का ट्रिगर दबा दिया है। बस एक चिंगारी, और सभ्यता विश्व युद्ध की अंधी खाई में धकेली जा सकती है। शहर धधकती चिताओं में बदल रहे हैं, आसमान में मिसाइलें हैं, और ज़मीन पर मासूमों का लहू। इसके बावजूद वैश्विक मंचों पर शब्दों का धुआँ उठता है, संकल्पों की राख उड़ती है, पर साहस की ज्वाला कहीं नहीं दिखती। हमारी चुप्पी इस हिंसा की सबसे भरोसेमंद संरक्षक बन चुकी है। हम सुरक्षित कमरों में बैठकर दृश्य देखते हैं, यह भूलकर कि लपटें कभी दीवारों और नक्शों से नहीं डरतीं। सवाल गूंजता है—आख़िर हम चाहते क्या हैं? शांति, या ऐसा भविष्य जहाँ बच्चों की पहली आवाज़ रोने की नहीं, धमाकों की हो?

मानवीय संकट का यह चेहरा किसी भी जीवित अंत:करण को तोड़ देने के लिए पर्याप्त है। अस्पतालों में दवाओं से ज्यादा चीखें हैं, शरण शिविरों में उम्मीद से ज्यादा हताशा पसरी है। माताएँ अपने बच्चों को सीने से चिपकाए आग बरसाते आसमान को ताकती हैं, जैसे ईश्वर से उत्तर मांग रही हों—क्यों? इज़राइल की गलियों में सायरनों की तीखी पुकार है, ईरान के मुहल्लों में धुएँ का घना अंधकार, और अमेरिकी सैनिकों की आँखों में डगमगाता विश्वास। यह केवल भूगोल की जंग नहीं, यह आने वाले कल का योजनाबद्ध संहार है। शरणार्थियों की पंक्तियाँ सीमाएँ पार कर रही हैं, अर्थव्यवस्थाएँ काँप रही हैं, और पर्यावरण जहरीले धुएँ में घुट रहा है। फिर भी विश्व समुदाय की प्रतिक्रिया नपी-तुली, कूटनीति में कैद और संवेदना से रिक्त दिखाई देती है। क्या हमारी संवेदनाएँ इतनी सस्ती हो चुकी हैं कि आँकड़ों में बदलती लाशें हमें सामान्य लगने लगी हैं?

हम सब अपने-अपने धर्मों को श्रद्धा से मानते हैं, अपने-अपने पवित्र ग्रंथों को आदर से पढ़ते और सुनते हैं। कोई कुरान की आयतों में रहमत खोजता है, कोई बाइबिल में प्रेम का आलोक, कोई तोराह में न्याय की पुकार, कोई गीता में कर्तव्य का मार्ग। हर ग्रंथ करुणा, संयम और मानवता की बात करता है। फिर यह कैसा रास्ता है जिस पर चलकर हम खून की धाराओं को बहने दे रहे हैं? यदि ईश्वर एक है, तो उसके नाम पर उसके बंदे इतने टुकड़ों में क्यों बंटे हैं? यदि प्रार्थनाएँ शांति के लिए उठती हैं, तो फैसले युद्ध के पक्ष में क्यों गिरते हैं? हम धर्म को अपनी पहचान की ढाल बना लेते हैं, पर उसके मूल संदेश को पीछे छोड़ देते हैं। आखिर हम चाहते क्या हैं—ईश्वर की सच्ची उपासना या सत्ता की प्यास में इंसानियत की आहुति?

वैश्विक चुप्पी का यह अपराध समय की दीवारों पर दर्ज होकर रहेगा। संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में शब्द गूँजते हैं, प्रस्ताव बनते हैं, पर धरती पर गोलियों की बरसात थमती नहीं। शक्तिशाली राष्ट्र अपने-अपने हितों की शतरंज बिछाए बैठे हैं; कोई तेल की चाह में, कोई प्रभुत्व की लालसा में, कोई सुरक्षा के आवरण में। मीडिया कुछ दिन कोलाहल करता है, फिर अगली सनसनी की ओर मुड़ जाता है। सोशल मीडिया पर हैशटैग उफान लेते हैं, पर बदलाव की ठोस लहर नहीं उठती। क्या 1945 के बाद जिस शांति का संकल्प लिया गया था, वह केवल इतिहास की किताबों तक सिमट गया? परमाणु आशंका की छाया फैल रही है, आतंक की जड़ें और गहरी हो रही हैं। हमारी चुप्पी इस धधकती आग को निरंतर हवा दे रही है।

दुनिया की जवाबदेही केवल सत्ताओं की चौखट तक सीमित नहीं, वह हर नागरिक के विवेक पर भी टिकी है। हम चुनावी मंचों पर विकास की दुहाई देते हैं, पर युद्ध को कभी निर्णायक प्रश्न नहीं बनाते। सस्ते ईंधन पर मुस्कुराते हैं, पर उसकी कीमत में घुली रक्तरंजित राजनीति पर चुप्पी साध लेते हैं। हथियारों के सौदे बढ़ते हैं, और हम शेयर बाज़ार की छलांग पर तालियाँ बजा देते हैं। क्या सच में हम निर्दोष हैं? हर खरीदी गई सुविधा, हर टाला गया प्रश्न, हर अनदेखा अन्याय इस त्रासदी की जंजीर की एक कड़ी है। यदि शांति हमारी सच्ची चाह है, तो हमारी आवाज़ नीतियों के दरवाज़े तक पहुँचनी ही होगी। वरना आने वाली पीढ़ियाँ कठोर स्वर में पूछेंगी—जब पृथ्वी धधक रही थी, तब आप किसके साथ खड़े थे?

भावनाओं की उस आग को महसूस कीजिए जो हर विस्फोट के साथ दिलों में भड़क उठती है। एक ईरानी माँ की चीख, एक इज़राइली बच्चे की सहमी हुई आँखें, एक अमेरिकी सैनिक का मौन— इन सबमें एक ही मानव पीड़ा है। दर्द का कोई मजहब नहीं, आँसू की कोई सीमा नहीं होती। सभ्यताएँ दरक रही हैं, पीढ़ियाँ आघात के साये में बड़ी हो रही हैं। यह टकराव केवल वर्तमान को नहीं, आने वाले दशकों को भी घायल कर रहा है। क्या हम इतने पत्थर हो चुके हैं कि परायी पीड़ा हमें हिला नहीं पाती? या हमने अपने भीतर की करुणा को सुविधाओं के बदले बेच दिया है?  आखिर हम चाहते क्या हैं—ऐसी विरासत जहाँ नफरत ही अगली पीढ़ी की पहचान बने?

यह समय केवल शोकगीत गाने का नहीं, आत्ममंथन का है। यदि संकल्प हो तो संवाद किसी भी बम से अधिक प्रभावशाली हो सकता है। यदि नीयत साफ हो तो सहानुभूति किसी भी प्रतिबंध से अधिक परिवर्तनकारी सिद्ध हो सकती है। मानवीय सहायता, निष्पक्ष मध्यस्थता और निर्भीक नेतृत्व—यही वे पुल हैं जो हमें इस खतरनाक दहलीज से पीछे ला सकते हैं। धर्मों की सच्ची शिक्षाएँ अमल मांगती हैं, केवल उद्धरण नहीं। यदि अपने ग्रंथों का सम्मान सचमुच करते हैं, तो करुणा को नीतियों की धुरी बनाना होगा। अब चुप रहना विकल्प नहीं, स्पष्ट अपराध है। इतिहास गवाह है कि उदासीनता भी विनाश की सहभागी होती है।

जब इतिहास की दीवारों पर युद्ध की परछाइयाँ काँपने लगें और सभ्यता स्वयं अपनी साँसों की आवाज़ सुनने लगे, तब सबसे असहज प्रश्न सीने पर दस्तक देता है—आख़िर हम सच में चाहते क्या हैं? मध्य पूर्व की यह दहकती आग पूरे विश्व को निगलने की क्षमता रखती है, यदि हम अब भी सुविधा की चादर ओढ़े चुप बैठे रहें। शांति कोई आदर्शवादी सपना नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता है। हमें तय करना होगा कि हम तमाशबीन रहेंगे या परिवर्तन के प्रहरी बनेंगे। अपनी आवाज़ उठाना, मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना, और युद्ध की स्वार्थी राजनीति को अस्वीकार करना—यही हमारी जिम्मेदारी है। वरना आने वाला कल हमें क्षमा नहीं करेगा। चुप्पी तोड़िए, क्योंकि कई बार एक निर्भीक स्वर ही इतिहास की दिशा बदल देता है। भावनाओं की आग में जलकर जागिए, क्योंकि कल बहुत देर हो सकती है। 


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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