काव्य :
माँ मैं भी खेलूँ होली सीमा पर
बच्चा करता हठ मांँ मैं भी खेलूँ होली।
कल ही तो तूने माँ मुझसे की थी बोली।
मैंने माँगें थे दो रूपए खाने को मिठी गोली।
तूने ही कहा था दूंगी पांच रुपए खेलने को होली।
कैसे भूल गई तू माँ, तूने किया जो वादा।
बस थोड़े से पैसे दे दे, नहीं चाहिए ज्यादा।
लाल हरा नीला पीला रंग और खरीदूं एक पिचकारी।
प्रेम प्यार से खेलूंगा होली, नहीं करूंगा मारामारी।
सबको ऐसा रंग लगाऊ, कोई पहचान में नहीं आये।
भर भर पिचकारी रंग उड़ाऊ, सब रंगों से सभी नहाये।
नाचें गाएं खुशियांँ मनायें, एकता का परचम लहराये।
प्रेम प्यार का ये त्यौहार है,दुश्मन को भी गले लगाये।
माँ मेरी अब एक ही इच्छा, मैं भी सीमा पर जाऊंगा।
जो सैनिक तैनात वहाँ पर, उनको रंग लगाऊंगा।
खुशी से वो भी झूम के बोले,भारत माता का जयकार।
कांँप उठेंगे दुश्मन सारे,सुनकर के उनकी ललकार।
तीन रंगों से बना तिरंगा हमारा, हमें हैं रंगों से प्यार।
जिस की खातिर हम,तन मन धन सब देते हैं वार।
इन्द्र धनुष के सात रंगों से आसमान में बने रंगोली।
सबको मुथा देता बधाई ,सबको मुबारक प्यारी होली।
- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव,
मुम्बई
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