काव्य :
महिला दिवस
महिला दिवस मनाने वाले कई,
कोख में मरवा देते हैं बेटियां ।
बेटों से बुढ़ापे में ठोकर खाते,
आग में झुलसा देते हैं बेटियां ।।
महिला दिवस मनाने वाले कई,
गैरों से लुटवा देते हैं बेटियां ।
न जाने कौन-से बाजार में,
बिकवा देते हैं लाचार बेटियां ।।
महिला दिवस मनाने वाले कई,
शान पर बलि चढ़ाते हैं बेटियां ।
न पूछो उनसे कहानी कोई,
सच को छुपा लेती हैं बेटियां ।।
महिला दिवस मनाने वाले कई,
अंधेरे में फेंक जाते हैं बेटियां।
मजबूर, लाचार, दुखी होकर,
दोहरा दायित्व निभाती हैं बेटियां ।।
- हेमलता शर्मा भोली बेन
इंदौर मध्यप्रदेश
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