काव्य :
नारी--कोई कीर्ति न तुमसे रहे शेष
निखरो,सँवरो और उभरो तुम
तुम शक्तिमान, हो दुर्गा तुम
पहुंचो सबसे, तुम उच्च शिखर
फूलों की खुशबू बन बिखरो तुम
करुणा का हो सागर ,
निर्मल,स्वच्छ गंगा हो तुम
प्रखर बनो सब पुरुषों से
बढ़ो , बनो आत्मनिर्भर तुम
तुम हँसो,कि जग ये पर्व करे
सम्मान करे व तुम पे गर्व करे
हर दिन हों तुम्हारे अब विशेष
ब्रज,कोई कीर्ति न तुमसे रहे शेष
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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