डिजीटल युग में नारी सुरक्षा
- सत्य प्रकाश , दिल्ली
नयी दिल्ली । विश्व की आधी आबादी आधुनिक और डिजिटल युग भी में एक अनजाने भय और अनिश्चितता में जी रही है जबकि विश्व व्यवस्था प्रबंधन की शीर्ष संस्था संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में नारी सुरक्षा शामिल है। समस्त राष्ट्रों की शासन व्यवस्थायें और सामाजिक संस्थान नारी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का दावा करते हैं लेकिन पारिवारिक और कार्यस्थलों में नारी समाज असहज और असुरक्षित महसूस करता है।
यूं तो प्रत्येक समय में नारी सुरक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय रही है, लेकिन जब आधुनिक समय में महिलायें जीवन के हर क्षेत्र में अपने पदचिन्ह बना रही है तो नई तकनीक तथा बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने सुरक्षा की नई चुनौतियां भी पैदा की हैं।
आधुनिक युग में नारी सुरक्षा के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ घर (परिवार) और कार्यस्थल हैं। पारिवारिक सुरक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जहां सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। घर को सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है, लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं। महिलाओं को सबसे ज्यादा मानसिक हिंसा का सामना पारिवारिक संबंधों में करना पडता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण..5 (2019-2021) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 30% महिलाओं ने कभी न कभी शारीरिक या यौन हिंसा का सामना किया है। वर्ष 2023 में 'पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता' में 1.33 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 जैसा कडा कानून तैयार किया गया है। यह कानून पत्नी या लिव-इन पार्टनर को पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक या आर्थिक शोषण से बचाने के लिए है। सरकार ने वन स्टॉप सेंटर और महिला हेल्पलाइन शुरू की है, जहां पीड़ित महिलाएं चिकित्सा, कानूनी और मनोवैज्ञानिक सहायता एक ही स्थान पर प्राप्त कर सकती हैं।
नारी सुरक्षा में दूसरी प्रमुख चुनौती कार्यस्थल पर आती है। महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाने के लिए कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण अनिवार्य है। 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम' के अतर्गत 10 से अधिक कर्मचारी वाले संस्थान में एक आंतरिक समिति का होना अनिवार्य है। इसके गठन, प्रबंधन और संचालन की जिम्मेदारी नियोक्ता को सौंपी गयी है। अध्ययनों के अनुसार, हिंसा के डर के कारण कई महिलाएं कार्यबल में शामिल होने से कतराती हैं और प्रति 1,000 महिलाओं पर लगभग 32 महिलाएं काम छोड़ देती हैं।
राष्ट्रीय महिला आयोग की अगस्त, 2025 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार नारी सुरक्षा स्कोर और सर्वेक्षण में भारत का समग्र सुरक्षा स्कोर 65% आंका गया है। सर्वेक्षण में शामिल 40% महिलाओं ने खुद को "असुरक्षित" या "उतना सुरक्षित नहीं" माना, जबकि 60% ने दिन के समय खुद को सुरक्षित महसूस किया। सबसे सुरक्षित शहर कोहिमा (82.9% स्कोर के साथ शीर्ष पर) को माना गया। इसके बाद विशाखापत्तनम, भुवनेश्वर, आइजोल, गंगटोक, ईटानगर और मुंबई का स्थान रहा। सबसे कम सुरक्षित शहर में क्रमश पटना, जयपुर, फरीदाबाद, दिल्ली , कोलकाता, श्रीनगर और रांची शामिल रहे। सुरक्षा को लेकर सर्वाधिक संवेदनशील समूह 18-24 वर्ष की युवा महिलाएं हैं। यह वर्ग सबसे अधिक असुरक्षित हैं। इस आयु वर्ग में उत्पीड़न की दर 14% है जो राष्ट्रीय औसत 7% से दोगुनी है। महिला उत्पीड़न की 38% घटनाएं पड़ोस में और 29% सार्वजनिक परिवहन में होती हैं।
दिन में शैक्षणिक संस्थानों में 86% महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं, लेकिन रात होते ही सुरक्षा का यह स्तर तेजी से गिर जाता है। इसके अलावा केवल 22% महिलाओं ने उत्पीड़न की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई, क्योंकि केवल 25% को ही अधिकारियों की प्रभावी कार्रवाई किए जाने का भरोसा था। संयुक्त राष्ट्र और राष्ट्रीय महिला सुरक्षा रिपोर्ट एवं सूचकांक (एनएआरआई) 2025 में दावा किया गया है कि लगभग दो-तिहाई उत्पीड़न की घटनाएं रिपोर्ट नहीं की जातीं हैं।
भारत में नारी के सम्मान और गरिमा की रक्षा के लिए एक सख्त कानूनी ढांचा तैयार किया गया है। भारतीय न्याय संहिता 2023 से महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए कड़े दंड का प्रावधान किये हैं। इसमें नाबालिगों से दुष्कर्म पर आजीवन कारावास और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित जैसे कड़े कानून शामिल हैं। नए कानूनों में ईमेल, व्हाट्सएप मैसेज और डिजीटल रिकॉर्ड को भी मुख्य साक्ष्य माना जाता है। आपातकालीन हेल्पलाइन स्थापित की गयी हैं जिनपर महिलाएं किसी भी संकट के समय संपर्क कर सकती हैं। सार्वजनिक परिवहन और टैक्सियों में पैनिक बटन अनिवार्य किए गए हैं। सरकार का पोर्टल शी बाक्स कामकाजी महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत ऑनलाइन दर्ज करने की सुविधा देता है।
नारी सुरक्षा के लिए महिलाओं को आर्थिक रुप से सक्षम बनाने के साथ साथ समाज की मानसिकता में समग्र बदलाव की आवश्यकता है। सुरक्षा केवल कानूनों से नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता बदलने और पुलिस प्रशासन को अधिक संवेदनशील बनाने से ही सुनिश्चित हो सकती है। लैंगिक समानता और नारी सशक्तिकरण के लिए समर्पित प्रमुख संस्था यूएन वुमेन ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा प्रणालियां विफल हो रही हैं जिससे भेदभाव और हिंसा बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र ने सरकारों से डिजिटल हिंसा को अपराध घोषित करने और तकनीकी कंपनियों को जवाबदेह बनाने का आह्वान किया है। संयुक्त राष्ट्र ने 'जेंडर स्नैपशॉट 2025' रिपोर्ट में हिंसा से सुरक्षा, डिजिटल समावेश और गरीबी से मुक्ति को भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।
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