काव्य :
इंतज़ार करती गलियाँ
होली पर इन गलियों का
अलग ही था कल रंग,
गली भी होली पर झूमी होगी
प्यारे-प्यारे बच्चों के संग।
सभी को साथ देख गली भी
सच ही खूब मुस्कुराई होगी,
रंगों में स्वयं को सतरंगी होते
देख वह भी खिलखिलाई होगी।
गलियों में भोर से ही
रंगों ने खूब छटा बिखराई,
फाग और लोकगीतों संग
बच्चों की किलकारी छाई।
आज फिर से सन्नाटा पसरा,
सब अपनी दिनचर्या में खोए हैं,
कोई दफ्तर, कोई विद्यालय,
कोई रसोई में व्यस्त हो गए हैं।
जिन गलियों में जान आ गई थी,
वे आज बेजान-से लगते हैं,
रंगों के प्यारे धब्बे सारे
धीरे-धीरे धुलते दिखते हैं।
फिर कब इकठ्ठा दिखेंगे सारे?
कब गूँजेगी हँसी-ठिठोलियाँ?
फिर किसी नए त्योहार के इंतज़ार में
नज़रें टिकाए रहेंगी ये गलियाँ…
-श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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