काव्य :
मत्तगयंद सवैया
होली के रंग
लाल गुलाल लिए सब रंग चले पथ में अपने बनवारी |
कौन कहे किससे कहिके यह बात पडोसन क्यों कह डारी ||
नीति व रीति प्रबोधन है यह मान प्रभाव कहे अनुचारी |
खेल रहे सब ग्वाल समीप सखी वनिता अरु राधिक प्यारी ||1
घूँघट की कर ओट चली जब ग्वालिन हाथन रंग भली है |
आय अली तब देख जरा बृजभानु लली सजाय चली है |
गोकुल के सब बाल बुलाय सजे अब तो यह कुंज गली है |
आकर बैठ गए सब लेकर एक दशा बन खेल खली है ||2
हाथ गुलाल अबीर छिपाय चली कर घूँघट ओट सजी है |
देख खडौं तब सम्मुख ही कि तभी वह मुस्काय लजी है |
कौन कहे अब खेलन कूँ रति रूपवती कह बात रजी है |
मोहन श्याम भले न दिखे सब संग वहाँ मुरली सहजी है ||3
- विनोद शर्मा , गाजियाबाद
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