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काव्य : प्रीत की पिचकारी - श्रीमती अंजना दिलीप दास , बसना छत्तीसगढ़


 काव्य : 

  प्रीत की पिचकारी 


होली आई जमकर,

नाचे झूमें सब मिलकर,

कि श्याम रंग चढ़ ही गया।

हो रंग जाए हम, निखर जाए हम,

जीवन में जो श्याम आ गया —

हो देखो होली आई।


बरसाने में गोपियों के

लट्ठों की बोली है,

ग्वालों की ढालों संग

निकलती हँसती टोली है।

रंगों में रंग जाए आज सारा जहाँ —

हो देखो होली आई।


प्रीत की पिचकारी से

जब कान्हा रंगते हैं,

राधा के सपने भी

सतरंगी बन ढलते हैं।

स्नेह की फुहार से रंगीन हो मन-अंगना —

हो देखो होली आई।


होली में गुजिए भी

स्वाद खूब बिखेरेंगे,

केसर-बादाम की ठंडाई

पीकर सब झूमेंगे।

रसिया गीत, ढोल-नगाड़ों संग

झूमें बूढ़े-नौजवान —

हो देखो होली आई।


होली आई जमकर,

नाचे झूमें सब मिलकर,

कि श्याम रंग चढ़ ही गया।

हो रंग जाए हम, निखर जाए हम,

जीवन में जो श्याम आ गया —

हो देखो होली आई।


-श्रीमती अंजना दिलीप दास 

बसना छत्तीसगढ़

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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