काव्य :
ग़ज़ल
साथ चलना बहुत ज़रूरी है
अब निकलना बहुत ज़रूरी है
रोज़ मिलते हैं आप ग़ैँरों से
खु़द से मिलना बहुत ज़रूरी है
हमसफ़र यार है अगर बनना
तब संभलना बहुत ज़रूरी है
जबसफलता नहींज़रा मिलती
यूँ बदलना बहुत ज़रूरी है
शान्त बैठो नहीं वहाँ हरगिज़
गर उबलना बहुत ज़रूरी है
- हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी
मीरपुर, कैण्ट, कानपुर -208004
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काव्य
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