व्यक्तित्व :
पाठकों को समर्पित व्यंग्यकार-विवेक रंजन श्रीवास्तव
- सुनील जैन राही , पालम गांव
व्यंग्य का संक्रमण काल है या स्वर्ण काल? तय है कि व्यंग्य की चर्चा और व्यंग्य जितना लिखा जा रहा उससे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। थोथा भ्रम है कि व्यंग्य पढ़ा नहीं जा रहा है, यदि ऐसा होता तो व्यंग्यकार कुछ भी लिखकर इतिश्री कर देते। जरा सी चूक व्यंग्यकार को थाना दर्शन करवा सकती है। जरूरी नहीं कि कबीर की तरह प्रहार किया जाए, प्रहार आप वरिष्ठ व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव की तरह भी कर सकते हैं। सांप भी मर जाए और व्यंग्यकार भी बच जाए। व्यंग्य अगर पढ़ा नहीं जा रहा होता तो व्यंग्य का कालम अखबार की मजबूरी न बन जाता? अखबार 16 पेज का हो या चार पेज का उसमें व्यंग्य की मौजूदगी तय करती है कि उसकी आवश्यकता सम्पादकीय से कम नहीं है। पाठक अखबार पढ़ते समय पाठक हत्या, बलात्कार, राजनीति, युद्ध और प्रेम के अलावा कुछ ऐसा पढ़ना चाहता है जिससे, वह क्षणिक आनंद या भावविभोर हो सके।
विशेष बात आज व्यंग्यकाल में एक ऐसे व्यंग्यकार भी जो व्यंग्य को पढ़ने-पढ़ाने के लिए समर्पित है। विवेक रंजन श्रीवास्तव स्वांत सुखाय के साथ-साथ पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे कितने साहित्यकार हैं जो अपनी लाइब्रेरी आम आदमी के लिए खोलकर बैठे हैं? यह कोई नहीं जानना चाहता कि किताब को कितना पढ़ा, कितने फोन आए, कितने मेसेज आए? किसी संस्था को पुस्तकें भेंट कर देना अलग बात है, लेकिन पुस्तक पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना उससे भी श्रेष्ठ कार्य है।
जबलपुर की भूमि आधुनिक व्यंग्य की कर्मभूमि कही जा सकती है। वैसे तो मध्य प्रदेश व्यंग्य की भूमि है, जहां व्यंग्यकारों की उपज बिना खाद-पानी के होती है। इलाका कोई सा भी हो। छोटे से छोटे गांव में दमदार व्यंग्यकार दिखाई दे जाएंगे। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि हर व्यंग्यकार को जमीन नहीं मिलती, मंच नहीं मिलता, माइक नहीं मिलता, लेकिन वह पूरी तन्मयता से व्यंग्य उगाने में लगा रहता है। विवेक रंजन श्री वास्तव को जमीन, माइक और मंच भी मिला। लेखन में निस्वार्थ भाव से लगे रहे हैं। खासियत है-व्यंग्य पढ़ना और उसके बारे में अखबारों में सटीक समीक्षा के माध्यम से उस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करना, व्यंग्य समारोह में शिरकत करना अपनी बात रखना और व्यंग्य के क्षेत्र में पदार्पण कर रहे व्यंग्यकारों को मुफीद जमीन दिखाना, वे कर्तव्य मान सक्रिय अवदान के लिए सदैव तत्पर रहते आए हैं।
विवेक रंजन केवल व्यंग्य के लिए काम करते हैं? व्यंग्य के पाठकों के लिए काम करते हैं, इसके लिए उन्होंने अपने घर पर डिब्बा लाइब्रेरी का संयोजन कर रखा है। पुस्तक उठाओ, घर ले जाओ, पढ़ो और फिर उसी बाॅक्स में रख दो। कोई इंट्री नहीं, कोई खतोकिताबत नहीं बस केवल समर्पण ही समर्पण। समीक्षा के लिए यह जरूरी नहीं कि उन्हें दो प्रतियां दी जाएं? उसके बाद ही उस कृति पर कलम दौड़ायेंगे। स्वयं किताबें खरीदकर गुणवत्ता और लेखक के कर्म को विस्तार से रुचिकर बनाते हुए प्रस्तुत करने की कला में माहिर है। यही कारण है कि उनके पाठक दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं यानी उनके माध्यम से व्यंग्य के पाठकों की वृद्धि दिन पर दिन हो रही है। इस महती कार्य के लिए व्यंग्य जगत निश्चित रूप से उनका ऋणी हैं। एक चैनल से ज्यादा वे व्यंग्य पाठक तैयार कर रहे हैं, व्यंग्य के पाठक।
वर्तमान परिवेश में अपनी पुस्तक तो हर कोई पढ़वाना चाहता है, लेकिन स्वयं दूसरे की पुस्तक पढ़कर दो शब्द लिखने की जहमत उठाना पसंद नहीं करता। पुस्तक पसंद आती तो संदर्भ के लिए लाइब्रेरी में सहेज कर रख लेता है। सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करने में कोताही बरतता है। वहीं विवेक जी इस कार्य में दक्षता के साथ सारे जहां में उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं।
विवेक जी केवल व्यंग्य पुस्तकों की बात नहीं करते, वे व्यंग्य आलोचना पर भी सिद्धहस्त हकदार माने जाते हैं। इस पुस्तक मेले (2026) व्यंग्य आलोचना पर श्री राहुल देव की पुस्तक आना थी, आई, डाॅ0 अतुल चतुर्वेदी की पुस्तक आना थी, लेकिन नहीं आ पाई। आ0 श्री सुभाष चन्दर की आलोचना पर पुस्तक आना थी, वह भी नहीं आई। डाॅ0 संजीव कुमार की व्यंग्य आलोचना पर कई पुस्तकें आईं, जिसमें व्यंग्य का इतिहास भी शामिल है-यह पुस्तक तो पढ़ने के बाद ही बता पाएगी कि श्री सुभाष चन्दर के लिखे व्यंग्य साहित्य से इतिहास कितना आगे या फिर.....?
बात विवेक रंजन श्रीवास्तव की- आलोचना पर आई पुस्तक ‘‘व्यंग्यः कल, आज और कल।’’ व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य के अलावा व्यंग्य के अन्य पहलुओं पर चर्चा प्रस्तुत करती है। व्यंग्य को वर्तमान की धरोहर मानने वालों को चुनौती पेश करती है कि व्यंग्य कल भी था आज भी और कल भी रहेगा। बिना उदाहरण के पुस्तक पर बात करना समझदारी नहीं है।
लखन कहा सुनु भृगकुल भूषण।
भट भटेश भय बिभूषण।।
कोटिन कोटि कपि केसरी नंदन।
समर भांति करिहहिं समंदन।।’’
बालकाण्ड
तीखा व्यंग्य जो लक्ष्मण द्वारा कहा गया। महाभारत काल की बात अक्सर व्यंग्यकार करते पाए जाते हैं, लेकिन इस प्रकार का उदाहरण कदाचित ही प्राप्त होता है। विवेक जी कबीर काल की बात करते हैं, नरेन्द्र कोहली की बात करते हैं। भला परसाई और जोशी के बिना हिन्दी व्यंग्य की कल्पना कैसे की जा सकती है। एक बात अवश्य विचारणीय है कि यह पुस्तक व्यंग्य पाठकों के लिए किसी हीरे से कम नहीं है। व्यंग्यकार, व्यंग्यकारों की बात करते हैं, लेकिन विवेक जी ने नागार्जुन के कवित्त में जो व्यंग्य बसा हुआ है उस पर चर्चा करके अचंम्भित कर दिया है। कविता में व्यंग्य की चर्चा कम ही पाई जाती है।
कुत्ता बैठा कार में, मानव मांगे भीख।
मिस्टर दुर्जन दे रहे, सज्जनमल को सीख।।
विवेक जी व्यंग्य साहित्य में महिला हस्तक्षेप को विस्तार से देखते हैं। आज जिस प्रकार महिलाओं का व्यंग्य क्षेत्र में जबरदस्त पदार्पण देखा जा रहा है, वह व्यंग्य के लिए सुखद पहलु है। नारी दृष्टि की अवलोकन क्षमता मात्र पुरूष पर न हो कर आसपास की विसंगतियों की सूक्ष्म पड़ताल तक जा पहंचती है।
यह तो तय है हिन्दी नाटक में व्यंग्य की वह प्रखर अनुभूति नहीं मिलती जो मराठी नाट्य संसार में देखने को आसानी से मिल जाती है। यह दीगर बात है कि मराठी नाटकों में अधिकांशतः फार्स के माध्यम से बात कही जाती है। बहरहाल हिन्दी नाटकों में व्याप्त व्यंग्य के कुछ चर्चित नामों का भी उल्लेख है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ व्यंग्यकार होने के साथ-साथ व्यंग्य पाठको को समर्पित करने वाले एक मात्र व्यक्ति हैं। जो व्यंग्य लिखने से लेकर पाठकों तक पहुंचाने तक का श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं।
- सुनील जैन राही , पालम गांव
एम-9810 960 285
----
.jpg)
