लघु कहानी :
माँ का दिल
आँगन में अजीब सा सन्नाटा पसरा था। जैसे दीवारें भी कड़वी आवाज़ों को समेटकर चुप हो गई हों। दरवाज़ा अभी-अभी ज़ोर से बंद हुआ था, उसकी गूँज अब भी हवा में तैर रही थी।
माँ दरवाज़े के पास ही खड़ी थी, उसके हाथ काँप रहे थे और आँखें लाल हो रही थीं ।
“तू क्या समझती है?” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “इस तरह अपने भाई को धक्के मारकर निकाल देगी और मैं खुश हो जाऊँगी?”
मीरा ने धीरे से दरवाज़े की कुंडी चढ़ाई। उसकी उँगलियाँ भी काँप रही थीं, पर चेहरे पर एक कठोर शांति थी। वह पलटी और धीमे, मगर ठंडे स्वर में बोली—
“क्यों माँ? जब उसने मुझे धक्के देकर निकाला था… तब तो तुम चुप थीं।”
माँ की आँखें झुक गईं। कुछ पल के लिए लगा जैसे वह टूट जाएगी… पर वर्षों की आदत ने उसे संभाल लिया।
“तेरे पिता और भाई के आगे मेरी क्या बिसात थी?… पर तू ये मत समझ कि मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ। कितनी ही रातें… मैंने चुपचाप आँसू बहाए हैं।”
मीरा की आँखों में दर्द चमका, पर आवाज़ अब भी संयत थी
“माँ, मैंने कितने आँसू बहाए… इसका तो कोई हिसाब ही नहीं है।”
माँ ने जैसे बात को टालने की कोशिश की,
“भूल जा! अब पुरानी बातें याद करने से क्या हासिल होगा? आज तू सक्षम है, तभी तो… भाई को घर से निकाल दिया।”
मीरा के होंठों पर हल्की-सी कड़वी मुस्कान आई,
“और , जो वो तुम्हें धक्के दे रहा था? तब भी क्या मैं चुप रहती?”
माँ थककर पास की चौकी पर बैठ गई।
“इस बड़े से घर का मैं क्या करूँ? तेरा भाई सड़क पर भटके और मैं यहाँ अकेली पड़ी रहूँ?” उसने आँचल से आँसू पोंछते हुए कहा।
कुछ पल के लिए लगा जैसे समय ठहर गया हो । हवा भी भारी हो गई।
मीरा , जो अब तक खुद को संभाले हुए थी हल्का-सा हँसी। वह हँसी सूखी थी, जैसे किसी पुराने घाव पर पड़ी पपड़ी।
“अकेली?” उसने धीमे से कहा, “माँ, तुम कब उसके साथ थीं? उसने तुम्हें कभी जीने दिया?”
माँ चुप रहीं । उसकी उँगलियाँ आँचल मरोड़ती रहीं, जैसे उन्हीं में अपने सारे जवाब ढूँढ रही हो।
मीरा आगे बढ़ी।
“पापा की पेंशन… ये घर… सब कुछ तो उसने अपने नाम करवा लिया था। तुम्हें क्या मिला?” उसकी आवाज़ अब तेज़ नहीं थी, पर हर शब्द चुभ रहा था।
“उस दिन अगर मैं न आती… तो शायद तुम भी सड़क पर होतीं।”
“नहीं!” माँ अचानक चीख पड़ी, “वो ऐसा नहीं करता… आखिर मेरा बेटा है वो।”
मीरा ने पहली बार सीधे माँ की आँखों में देखा। उसकी आँखों में आंसू थे, पर उनमें सवाल भी था
“और मैं?”
माँ चुप। जैसे शब्द उसके गले में अटक गए हों।
कुछ पल बाद मीरा ने मेज़ पर रखे काग़ज़ उठाए।
“ठीक है माँ… अगर तुम्हें उसी के पास जाना है, तो जाओ। ये घर भी उसे दे देना।”
माँ की आवाज़ में पहली बार डर उतर आया
“तू… तू मुझे छोड़ देगी?”
मीरा मुस्कुराई , इस बार उसकी आँखें भीग चुकी थीं
“छोड़ा तो आपने मुझे था… दस साल पहले।”
यह सुनते ही माँ का सिर झटके से उठा। जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से हरा हो गया हो।
मीरा की आवाज़ अब टूटने लगी थी
“जब मुझे मंडप से उठा लिया गया था… तब आप सबने मुझे ही दोषी ठहराया था… मेरी गलती क्या थी ? माँ! मैं तो उसे जानती भी नहीं थी पर किसी ने मुझ पर भरोसा नहीं किया । आप सबने मुझे छोड़ दिया।”
माँ की आँखों से आँसू बहने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, पर शब्द साथ नहीं दे रहे थे।
“दो साल पहले जब पापा अस्पताल में थे… तब आपका ‘इकलौता बेटा’ कहाँ था? मैं थी न… हर पल तब आपके साथ । फिर भी आपने मुझे उनके पास नहीं जाने दिया।”
माँ की साँसें तेज़ हो गईं। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
“पापा के जाने के बाद भी… मुझे उनकी आख़िरी झलक तक देखने नहीं दी।”
मीरा की आवाज़ भर्रा गई।
कमरे में सिर्फ घड़ी की टिक-टिक गूंज रही थी,मानो हर सेकंड बीते हुए सालों का हिसाब मांग रही हो।
मीरा ने काग़ज़ माँ के सामने रख दिए—
“साइन कर दीजिए… फिर बुला लीजिए उसे।अपने ‘इकलौते प्यारे बेटे’ को।”
माँ के हाथ काँप रहे थे। उसने काग़ज़ उठाए… आँखों के सामने अक्षर धुंधले हो गए।कुछ पल… बहुत भारी, बहुत लंबे।
फिर अचानक उसने काग़ज़ फाड़ दिए।
मीरा चौंक गई।
“माँ…?”
माँ की आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे भीतर से कुछ बिखर गया हो
“इकलौता…?”
वह धीमे से हँसी, पर वह हँसी दर्द से भरी थी
“शायद मैं ही अंधी थी… जो दो बच्चों में से एक को देख ही नहीं पाई।”
वह धीरे-धीरे उठी और मीरा के पास आईं।
हर कदम जैसे पछतावे से भारी था।
“अगर अभी भी देर न हुई हो…” उसने काँपते हाथ आगे बढ़ाए,
“तो क्या तू… तू मुझे माफ कर देगी?”
मीरा अब खुद को रोक नहीं पाई। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
उसने कुछ नहीं कहा , बस आगे बढ़कर माँ को कसकर पकड़ लिया।
माँ ने भी उसे थाम लिया—जैसे बरसों से बिछड़ा कोई अपना वापस मिल गया हो।
आँगन का सन्नाटा अब टूट चुका था।
दीवारें गूँज रही थीं पर इस बार चीखों से नहीं…
रिश्तों के फिर से जीवित होने की धीमी, सुकून भरी धड़कनों से।
- मधूलिका श्रीवास्तव
भोपाल (म.प्र.)
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