समीक्षा :
किताबों की दुनिया : द्वारा - लतिका जाधव, पुणे
भारतीय भाषा और लिपि का सार्थक इतिहास है ले. डॉ. हरिसिंह पाल का निबंध संग्रह 'आदि – इत्यादि '
डॉ. हरिसिंह पाल जी के द्वारा लिखित 'आदि - इत्यादि' इस निबंध संग्रह में भारतीय भाषा और लिपि का सार्थक इतिहास है ।आज हमारे बहुतांश विद्यालयों में इंग्लिश मीडियम के कारण भारतीय भाषाएँ और लिपि का इतिहास ठीक से पढ़ाया नहीं जाता है। जिस कारण बच्चों को अपनी मातृभाषा की लिपि कौनसी है? उसका नाम क्या है? इस बात का भी पता नहीं होता है। इसलिए इस पुस्तक में लिखे हर निबंध को हमें बच्चों के साथ आम लोगों को भी परिचित कराना जरूरी लगता है।
इन निबंधों की विशेषता बताते हुए यहां लेखक द्वारा लिखे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को रखना उचित लगता है। जिन मुद्दों पर हमारी भाषा और लिपि विराजमान हैं।
भाषा और लिपि का महत्व समझाते हुए आपने यह लिखा है, “मनुष्य लिपि और भाषा के माध्यम से ज्ञान और विज्ञान को प्राप्त करता है।लिपिबद्ध भाषा के सहारे अपने अनुभवों को एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुंचा सकता है” इस मुद्दे को कोई भी नकार नहीं सकता है।वैसे ही इस बात को भी अब स्वीकार किया है, “श्रुति परंपरा से प्राप्त ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी लिपि के माध्यम से ही संरक्षित और संवर्धित रहा है”
नागरी लिपि की विशेषता स्पष्ट करते हुए इस बात को महत्व देना जरूरी है, “ विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि होने के कारण ही नागरी लिपि में लिखा गया ज्ञान और साहित्य सरल,सुगम और बोधगम्य बना रहा”(पृ.9से 11)
लेखक विचार से , “लिपि ध्वन्यात्मक भाषा को दृश्य सांकेतिक चिह्नों में परिवर्तित करने की विधि है।जिस प्रकार भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का माध्यम है, उसी प्रकार लिपि भाषा का वाहक रथ है, जिसपर सवार होकर भाषा पाठक तक पहुंच पाती है, लिपि एक प्रकार से दृश्य भाषा ही है" (पृ.16) यह बिल्कुल सही विवेचन किया गया है। भाषा और लिपि से जुड़े सभी निबंधों को पढ़कर वैचारिक आनंद की अनुभूति मिलती है ।
भाषा और लिपि से जुड़े सभी निबंधों में हिंदी भाषा का महत्व, हिंदी भाषा के प्रति प्रेम तथा हिंदी भाषा में लेखन करने की प्रेरणा देनेवाले महानुभावों, लेखकों का कार्य और महत्ता को स्पष्ट किया गया है। जो एक मौलिक संशोधन ही है।
अमीर खुसरो के बारे में ऐतिहासिक दृष्टि से विवेचन करते हुए, "अमीर खुसरो पहले रचनाकार थे, जिन्होंने भाषा के रूप में ‘हिंदवी’ या ‘हिंदुई’ शब्द का प्रयोग किया, जो बाद में 'हिंदी' के रूप में प्रचलन में आई” (पृ.156) इस संदर्भ से यह भी स्पष्ट होता है, भाषा बहती नदी के प्रवाह जैसी होती है। वह भेदभाव नहीं करती इसलिए भाषा को धर्म, जाति में बांधना अनुचित ही होगा। जिसका उदाहरण यहां अमीर खुसरो पर लिखे निबंध से ज्ञात होता है।
भाषा और लिपि का इतिहास अनेकों संदर्भों के साथ देकर ज्ञान की वृद्धि बढ़ाने वाला यह निबंध संग्रह डॉ. हरिसिंह पाल जी ने जो लिखा है, पाठक इस निबंध संग्रह को पढ़कर अपनी जानकारी जरूर समृद्ध करेंगे इस अभिलाषा के साथ, डॉ. हरिसिंह पाल जी का अभिनंदन!
द्वारा - लतिका जाधव, पुणे ( महाराष्ट्र)
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आदि -इत्यादि
(हिंदी भाषा लिपि साहित्य विषय निबंध संग्रह)
ले. डॉ हरिसिंह पाल,
प्रकाशक- एस. कुमार एण्ड कंपनी, दरिया गंज, नई दिल्ली, 2024
मूल्य - 550/-, पृ.सं. -177
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संपादक, श्री. देवेंद्र भाई सोनी जी,
ReplyDeleteमेरा आलेख युवा प्रवर्तक में प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत आभार! 🙏
लतिका जाधव
उत्कृष्ट समीक्षा है। डा हरिसिंह पाल के लेखन पर लेखन करना, एक साहस भरा कदम है। डा पाल अपनी कृति में जीवन का अनुभव उडेेल देते हैं। समीक्षक डा लतिका जाधव ने थोडे से शब्दों में पुस्तक का मूल कथ्य लिख दिया है। लेखिका को बहुत बहुत साधुवाद एवं शुभकामनाएं।
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